जिस इंसान का मन पवित्र नहीं है उसकी कभी भी जय जय कार नहीं हो सकती है
स्वामी रामतीर्थ का जन्म दीपावली के दिन साल 1873 को पंजाब के गुजरावालां में हुआ था। स्वामी के पिता का नाम पण्डित हीरानन्द गोस्वामी था। रामतीर्थ का बचपन बड़ी ही निर्धनता में बीता। भूख और आर्थिक कमजोरी के बीच भी उन्होंने कठीन परिश्रम से अपनी माध्यमिक और फिर उच्च शिक्षा पूरी की थी रामतीर्थ के …
स्वामी रामतीर्थ का जन्म दीपावली के दिन साल 1873 को पंजाब के गुजरावालां में हुआ था। स्वामी के पिता का नाम पण्डित हीरानन्द गोस्वामी था। रामतीर्थ का बचपन बड़ी ही निर्धनता में बीता। भूख और आर्थिक कमजोरी के बीच भी उन्होंने कठीन परिश्रम से अपनी माध्यमिक और फिर उच्च शिक्षा पूरी की थी रामतीर्थ के पिता ने कम आयु में ही उनका विवाह करा दिया था। जिसके रामतीर्थ अपनी उच्च शिक्षा के लिए वह लाहौर चले गए। जहां उन्हें स्वामी विवेकानन्द के प्रवचन सुनने का अवसर मिला, जिससे वो बहुत प्रभावित हुए। रामतीर्थ के जीवन में शंकराचार्य और स्वामी विवेकानन्द के विचारों का विशेष प्रभाव था। उनका कहना था “भारत भूमि मेरा शरीर है, कन्याकुमारी मेरे पैर हैं और हिमालय मेरा सिर”। इसी तरह के उनके कई विचार है जो लोगो को प्रभावित करते है।
स्वामी रामतीर्थ के विचार
- जिस इंसान का मन पवित्र नहीं है उसकी कभी भी जय जय कार नहीं हो सकती है।
- तुम समाज से जुड़े हुए हो ! तुम समाज के साथ ही ऊपर उठ सकते हो और समाज के साथ ही तुम्हें नीचे गिरना होगा। यह नितांत असंभव है कि कोई व्यक्ति अपूर्ण समाज में पूर्ण बन सके।
- जो आज़ादी पाप की गुलामी कर रही हो, उस आजादी को खत्म कर देना चाहिए।
- विद्या व ज्ञान का दान सर्वोपरि श्रेष्ठ दान होता है, जो आप किसी मनुष्य को दे सकते है।
- यदि कोई प्यारी चीज़ भी आत्म साक्षात्कार में बाधा बन रही हो तो उस प्यारी चीज को भी तुरंत हटा देना चाहिए।
- वेदान्त की पुस्तकों को अलमारियों में बंद रखने से काम नहीं चलेगा, तुम्हें आचरण में लाना होगा। संसार के धर्म-ग्रन्थों को उसी भाव से ग्रहण करना चाहिए, जिस प्रकार रसायनशास्त्र का हम अध्ययन करते हैं और अपने अनुभव के अनुसार अन्तिम निश्चय पर पहुंचते हैं।
- जिस समय दुनिया के सभी लोग तुम्हारी प्रशंसा करेंगे तो वो समय तुम्हारे रोने का होगा।
- यदि तुमने आसक्ति का राक्षस नष्ट कर दिया तो इच्छित वस्तुएं तुम्हारी पूजा करने लगेंगी।
- केवल आत्मज्ञान ही ऐसा है जो हमें सब ज़रूरतों से परे कर सकता है।
- यदि आप अहंकार और स्वार्थ को नहीं छोड़ सकते तो आप सच्चा कार्य नहीं कर सकते।
- आलस्य मृत्यु के समान है, और केवल उद्यम ही आपका जीवन है।
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