ये महलों ये तख़्तों ये ताजों की दुनिया
ये महलों ये तख़्तों ये ताजों की दुनिया ये महलों ये तख़्तों ये ताजों की दुनिया ये इंसाँ के दुश्मन समाजों की दुनिया ये दौलत के भूके रिवाजों की दुनिया ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है ताज-महल अन-गिनत लोगों ने दुनिया में मोहब्बत की है कौन कहता है कि सादिक़ न थे …
ये महलों ये तख़्तों ये ताजों की दुनिया
ये महलों ये तख़्तों ये ताजों की दुनिया
ये इंसाँ के दुश्मन समाजों की दुनिया
ये दौलत के भूके रिवाजों की दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है
ताज-महल
अन-गिनत लोगों ने दुनिया में मोहब्बत की है
कौन कहता है कि सादिक़ न थे जज़्बे उन के
लेकिन उन के लिए तश्हीर का सामान नहीं
क्यूँकि वो लोग भी अपनी ही तरह मुफ़्लिस थे
तेरी आवाज़
रात सुनसान थी बोझल थीं फ़ज़ा की साँसें
रूह पर छाए थे बे-नाम ग़मों के साए
दिल को ये ज़िद थी कि तू आए तसल्ली देने
मेरी कोशिश थी कि कम्बख़्त को नींद आ जाए
तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा
तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा
इंसान की औलाद है इंसान बनेगा
अच्छा है अभी तक तेरा कुछ नाम नहीं है
तुझ को किसी मज़हब से कोई काम नहीं है
वो सुब्ह कभी तो आएगी
वो सुब्ह कभी तो आएगी
इन काली सदियों के सर से जब रात का आँचल ढलकेगा
जब दुख के बादल पिघलेंगे जब सुख का सागर छलकेगा
जब अम्बर झूम के नाचेगा जब धरती नग़्मे गाएगी
वो सुब्ह कभी तो आएगी
शिकस्त
अपने सीने से लगाए हुए उम्मीद की लाश
मुद्दतों ज़ीस्त को नाशाद किया है मैंने
तू ने तो एक ही सदमे से क्या था दो-चार
दिल को हर तरह से बर्बाद किया है मैंने
जब भी राहों में नज़र आए हरीरी मल्बूस
सर्द आहों में तुझे याद किया है मैंने
