रूह की प्यास…
हिंदी के नामचीन लेखक कभी इतना साहस नहीं जुटा सके कि ये कहें कि मैंने डरावनी और कामुक यानी हॉरर लस्टी कहानियां लिखी हैं। जबकि जानीमानी पत्रकार व लेखिका जयंती रंगनाथन के हालिया कहानी संग्रह को ख़ुद उन्होंने और वाणी प्रकाशन ने यह कह कर प्रचारित किया कि ये हॉरर लस्टी कहानियों का संग्रह है। …
हिंदी के नामचीन लेखक कभी इतना साहस नहीं जुटा सके कि ये कहें कि मैंने डरावनी और कामुक यानी हॉरर लस्टी कहानियां लिखी हैं। जबकि जानीमानी पत्रकार व लेखिका जयंती रंगनाथन के हालिया कहानी संग्रह को ख़ुद उन्होंने और वाणी प्रकाशन ने यह कह कर प्रचारित किया कि ये हॉरर लस्टी कहानियों का संग्रह है।
इस वजह से दो बातें ज़हन में एक साथ उठीं। पहली तो ये कि क्या वजह है कि जयंती रंगनाथन ने लेखन के इस विधा (जॉनर) को चुना? और दूसरी ये कि क्या हिंदी के प्रकाशकों को भी अब ये लगने लगा है कि हिंदी में इस विधा की किताबें निकाली जानी चाहिए? क्योंकि अब तक हिंदी के लेखकों ने कभी लेखन के इस विधा में कुछ लिखने की कोशिश शायद इसलिए नहीं की क्योंकि वे साहित्यिक शुचिता की बेड़ियों में ही जकड़े रहे। या ये भी हो सकता है कि प्रकाशकों ने ही हिंदी की किताबों के लिए इस जॉनर को प्रतिबंधित रखा।

रूह की प्यास में संकलित छह हॉरर लस्टी कहानियों को पढ़ने के बाद महसूस हुआ कि अच्छा हुआ इस विधा में लिखने की शुरुआत जयंती रंगनाथन से हुई। डरावनी कामुक कहनियों को पढ़ते वक़्त जो सबसे ज़ायज़ ख़तरा होता है, वो ये है कि कलम ज़रा-सी इधर-उधर भटकी नहीं कि आपका लेखन सतही और स्तरहीन हुआ नहीं।
पर इन कहानियों की सबसे कमाल बात ये रही कि इन कहानियों को पढ़ते समय डर भी महसूस हुआ, कामुकता भी महसूस हुई, लेकिन यह सब बहुत स्तरीय तरीक़े से हुआ। इसमें कहीं भी सस्तापन नहीं आया और ये इस संग्रह का यूएसपी है, जिसके लिए लेखिका बधाई की पात्र हैं।
इस संग्रह में कुल छह कहानियां हैं: रेजार्ट के जानवर, ख़ुशबुओं के गांव में, गलियां यहां ख़त्म नहीं होतीं, चमेली गढ़ की देवी, नींद के गांव में, दर्द ने सिर उठाया तो दुहाई मांगोगे। सारी कहानियां अपने साथ-साथ दिलचस्प अंदाज़ में पाठक को डर और कामुकता के अलग-अलग कोणों की ओर ले चलती हैं।
एक अच्छा लेखक कैसे इस विधा की कहानियों में भी लंबे अर्से से हमारे समाज में व्याप्त आडंबरों को ला सकता है और कैसे वो समाज के सबसे उपेक्षित वर्ग को भी सामने ले आता है ये आप इन कहानियों को पढ़ते हुए महसूस करते जाते हैं।
बात इस संग्रह की कमी की करूं तो सबसे बड़ी कमी है इसका नाम। हालिया लेखन में फिर वो चाहे वो प्रिंट मीडिया हो या डिजिटल मीडिया।।। सभी जगह इस बात की स्पष्ट छाप दिखती है कि ‘सेक्स बिकता है’। इस कहानी संग्रह का नाम ‘रूह की प्यास’ पर भी यही छाप दिखाई देती है।
इसकी वजह से ऐसा हो सकता है कि वो तबका आकर्षित हो कर इसे पढ़े, जो हॉरर लस्टी कहानियां पढ़ने में रुचि रखता हो। इससे एक अच्छी बात ये होगी कि उस तबके को कुछ स्तरीय कहानियां पढ़ने मिलेंगी। लेकिन बड़ा ख़ामियाज़ा ये भी हो सकता है कि एक बड़ा तबका, जो जयंती जैसे लेखकों को पढ़ने में रुचि रखता है, वो इसे इसलिए न पढ़े कि पढ़ते समय कवर तो दिखाई देगा ही।
और इस वजह से वह इन कहानियों को पढ़ने से वंचित रह जाए। इस स्तरीय हॉरर लस्टी कहानियों वाले संग्रह का नाम बेहतर रखा जा सकता था। बावजूद इसके इस संग्रह की कहानियों को पढ़ना बिल्कुल बनता है!
