हरदोई: गमगीन माहौल में कर्बला पहुंचकर सुपुर्द ए खाक किए जा रहे ताजिए
हरदोई। मोहर्रम में जनपद सहित पूरे क्षेत्र में ताजियादारों ने घरों व इमामबाड़ों से ताजिऐं निकाल रहे हैं और गमे शहादत-ए-हुसैन मनाया जा रहा है। जिले में अलग-अलग घरों से ढोल ताशों और मातमी धुनों के साथ निकले ताजियों के आगे-आगे मुस्लिमों का बड़ा हुजूम इमाम हुसैन और शहीद-ए-कर्बला की याद में मरशिये नाहे पढ़ते …
हरदोई। मोहर्रम में जनपद सहित पूरे क्षेत्र में ताजियादारों ने घरों व इमामबाड़ों से ताजिऐं निकाल रहे हैं और गमे शहादत-ए-हुसैन मनाया जा रहा है। जिले में अलग-अलग घरों से ढोल ताशों और मातमी धुनों के साथ निकले ताजियों के आगे-आगे मुस्लिमों का बड़ा हुजूम इमाम हुसैन और शहीद-ए-कर्बला की याद में मरशिये नाहे पढ़ते नजर आ रहे हैं। विभिन्न इमामबाड़ों से उठे ताजियों का परंपरागत स्थानों से ताजिए दार, ताजिया कंधों पर रखकर कर्बला के लिए निकल रहे हैं।
हजरत मोहम्मद साहब के नवाशे हजरत इमाम हुसैन को 72 साथियों और उनके परिवारीजनों के साथ कर्बला के मैदान में मुहर्रम के दसवीं तारीख को ही धोखे से बुलाकर शहीद कर दिया गया था। जिसकी याद में सिया समुदाय के लोग शोक मनाते हैं तथा सुन्नी समुदाय इमाम हुसैन की शहादत पर उनकी बहादुरी को याद करते हैं।
इस्लाम धर्म में मुहर्रम की 10वीं तारीख यौम-ए-आशूरा के नाम से जानी जाती है जो हजरत इमाम हुसैन की शहादत की याद में मातम के तौर पर मनाई जाती हैं। इमाम हुसैन के साथ उनके कई अनुयायी कर्बला के मैदान में शहीद हुए थे। इमाम हुसैन इस्लाम धर्म के प्रवर्तक और पैगंबरा हजरत मोहम्मद (सल्लाहलाहु अलैहि व सल्लम) के नवासे थे। हजरत अली (रअ) अरबिस्तान (मक्का-मदीना वाला भू-भाग) के खलीफा यानी मुसलमानों के धार्मिक-सामाजिक, राजनीतिक मुखिया थे।
हजरत अली के स्वर्गवास के बाद लोगों की राय इमाम हुसैन को खलीफा बनाने की थी, लेकिन अली के बाद हजरते अमीर मुआविया ने खिलाफत पर कब्जा किया। मुआविया के बाद उसके बेटे यजीद ने साजिश रचकर दहशत फैलाकर और बिकाऊ किस्म के लोगों को लालच देकर खिलाफत हथिया ली।
दरअसल यजीद शातिर शख्स था जिसके दिमाग में प्रपंच और दिल में जहर भरा हुआ था। चूंकि यजीद जबर्दस्ती खलीफा बन बैठा था, इसलिए उसे हमेशा इमाम हुसैन से डर लगा रहता था। चालबाज और क्रूर तो यजीद पहले से ही था, सत्ता का नेतृत्व हथियाकर वह और खूंखार व अत्याचारी भी हो गया। यजीद दुर्दांत शासक साबित हुआ। अन्याय की आंधी और तबाही के तूफान उठाकर यजीद लोगों को सताता था। यजीद जानता था कि खिलाफत पर इमाम हुसैन का हक है क्योंकि लोगों ने ही इमाम हुसैन के पक्ष में राय दी थी। यजीद के आतंक की वजह से लोग चुप थे।
इमाम हुसैन चूंकि इंसाफ के पैरोकार और इंसानियत के तरफदार थे, इसलिए उन्होंने यजीद की बैअत नहीं की। इमाम हुसैन ने हक और इंसाफ के लिए इंसानियत का परचम उठाकर यजीद से जंग करते हुए शहीद होना बेहतर समझा, लेकिन यजीद जैसे बेईमान और भ्रष्ट शासक और बैअत करना मुनासिब नहीं समझा। यजीद के सिपाहियों ने इमाम हुसैन को चारों तरफ से घेर लिया था, नहर का पानी भी बंद कर दिया गया था, ताकि इमाम हुसैन और उनके साथी यहां तक कि महिलाएं और बच्चे भी अपनी प्यास नहीं बुझा सकें।
तब प्यास को बर्दाश्त करते हुए इमाम हुसैन बड़ी बहादुरी से ईमान और इंसाफ के लिए यजीद की सेना से जंग लड़ते रहे। यजीद ने शिमर और खोली का साथ साजिश का सहारा लेकर प्यासे इमाम हुसैन को शहीद कर दिया। पिहानी कस्बे के कर्बला में शिया समुदाय के लोग पहुंचकर इमाम हुसैन की शहादत को याद कर जोर-जार रो रहे हैं।
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