बरेली: मनोरोग से हुए ठीक, लेकिन दिवाली पर नहीं लौटेंगे घर
बरेली, अमृत विचार। मानसिक अस्पताल में कई ऐसे मानसिक रोगी हैं, जो ठीक होने के बाद भी अपने घर नहीं जा पा रहे हैं। वर्षों हो गए, मगर इन्हें लेने के लिए कोई अपना नहीं आया। अब इन मरीजों की घर जाने की आस धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। करीब 10 से अधिक मरीज ऐसे हैं, …
बरेली, अमृत विचार। मानसिक अस्पताल में कई ऐसे मानसिक रोगी हैं, जो ठीक होने के बाद भी अपने घर नहीं जा पा रहे हैं। वर्षों हो गए, मगर इन्हें लेने के लिए कोई अपना नहीं आया। अब इन मरीजों की घर जाने की आस धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। करीब 10 से अधिक मरीज ऐसे हैं, जो ठीक हो चुके हैं। घर जाने के लिए परिजनों की राह देख रहे हैं।
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हालांकि, ठीक होने के बाद इन्हें हॉफवे होम में संरक्षण दिया जा रहा है। मनोचिकित्सकों का कहना है कि इन मरीजों के परिजन ठीक होने के बाद स्वीकार नहीं कर रहे हैं। परिजनों को लगता है कि घर ले जाने के बाद इनकी देखभाल करनी पड़ेगी। कई मामलों में मरीज पूरी तरह ठीक होने के बाद भी अपना परिचय व पता नहीं बता पाते हैं, जिस कारण भी परिजनों से संपर्क नहीं हो पाता है।
35-40 उम्र की तीन महिलाओं को मानसिक चिकित्सालय में स्थानीय लोगों ने बच्चा चोर संदिग्ध मानते हुए पुलिस के सुपुर्द कर दिया। मानसिक स्थिति ठीक न होने पर इन्हें मानसिक चिकित्सालय में भर्ती करा दिया गया। उपचार के बाद उनकी स्थिति में सुधार आया। पूरी तरह ठीक होने के बाद भी अपना पता बनाने में असमर्थ रहीं। जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के अनुसार उन्हें हॉफवे होम में शिफ्ट किया गया। जहां उन्हें समय-समय पर उपचार के लिए चिकित्सालय लाया जा रहा है।
रिमांडर भेजने के साथ परिजनों को फोन भी किया जाता है
मानसिक चिकित्सालय प्रशासन के अनुसार मरीज की स्थिति बेहतर होने के बाद उनसे घर का पता व अन्य जानकारी पूछी जाती है। उनके परिजनों को घर ले जाने के लिए रिमाइंडर भेजते हैं। जिन परिजनों के फोन नंबर उपलब्ध हैं, उन्हें फोन भी किया जाता है। कुछ मामलों में साइकेट्रिक सोशल वर्कर जब मरीज को उनके घर लेकर जाता है तो पहले परिजन उसे रख तो लेते हैं। बाद में घरवाले दवाइयां बंद कर देते हैं, जिससे उनकी हालत फिर से खराब होने लगती है। ऐसे में परिजन फिर से मनोचिकित्सा केंद्र में छोड़कर चले जाते हैं।
दिवाली पर परिवार से मिलकर नहीं रहा खुशी का ठिकाना
मानसिक चिकित्सालय में भर्ती मुकेश (काल्पनिक नाम) 2021 में नई दिल्ली से घर के लिए निकले। मानसिक संतुलित ठीक न होने पर वह भटकते हुए बरेली जंक्शन पर आ गए। स्थानीय लोगों ने बच्चा चोर समझकर उन्हें पुलिस के सुपुर्द कर दिया। उन्हें मानसिक चिकित्सालय में भर्ती कराया गया। एक साल के उपचार के बाद वह स्वस्थ हो गए। पूछताछ के दौरान पता चला कि वह पश्चिम बंगाल के मूल निवासी हैं, जो दिल्ली में कूड़ा बीनकर जिंदगी गुजर बसर कर रहे थे।
उन्होंने अस्पताल प्रशासन को परिजनों का नंबर बताया। उन्होंने परिजनों से बातचीत कर उन्हें जानकारी दी। जिसके बाद पता लगा कि परिवार वालों के पास टिकट के भी पैसे भी नहीं हैं। जहां मानवता का परिचय देते हुए एक तरफ का किराया देते हुए मुकेश को कागजी कार्रवाई के बाद परिजनों को सौंपा गया। दिवाली के मौके पर परिजनों से मिलकर उनका खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
तमिलनाडु में घूमते हुए किया रेस्क्यू, परिवार से हुआ मिलन
देवरनिया के ग्राम मुड़िया जागीर निवासी इंद्रपाल की पत्नी रामश्री छह मार्च 2022 को लापता हो गई थीं। परिजनों के अनुसार उनका मानसिक उपचार चल रहा था। 28 मई 2022 को वह चेन्नई (तमिलनाडु) में सड़कों पर घूमती हुई मिलने पर उन्हें रेस्क्यू किया गया। उन्हें श्रद्धा रिहैबिलिटेशन फाउंडेशन के ट्रस्टी डा. भरत वाटवानी (मनोचिकित्सक) की देखरेख में उनका मानसिक इलाज हुआ। सोशल वर्कर अंजनी और मुकुल ने उनकी काउंसलिंग की। ठीक होने के बाद रामश्री ने परिजनों के संबंध में जानकारी दी। टीम ने उन्हें गांव मुड़िया जागीर पहुंचाया।
सभी परिजनों से आग्रह है कि मरीज के ठीक होने के बाद उन्हें घर के वातावरण में रखकर सहानुभूतिपूर्वक उनके साथ पेश आएं और समाज में उन्हें पुन: स्थापित करने में सहयोग करें। मानसिक रोगों का इलाज दवा और मनोवैज्ञानिक तरीके से किया जाता है। इसके अलावा परिवार व समाज की भी इसमें अहम भूमिका होती है। उसे नजरअंदाज करने पर मरीज में सुधार की संभावना कम हो जाती है।डा. सीपी मल्ल, निदेशक, मानसिक चिकित्सालय, बरेली
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