घर से यह सोच उठी थी, उपहार उन्हें मैं दूँगी… हरिवंशराय बच्चन

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घर से यह सोच उठी थी उपहार उन्हें मैं दूँगी, करके प्रसन्न मन उनका उनकी शुभ आशिष लूँगी । पर जब उनकी वह प्रतिभा नयनो से देखी जाकर, तब छिपा लिया अञ्चल में उपहार हार सकुचा कर । मैले कपड़ों के भीतर तण्डुल जिसने पहचाने, वह हार छिपाया मेरा रहता कब तक अनजाने ? मैं …

घर से यह सोच उठी थी

उपहार उन्हें मैं दूँगी,

करके प्रसन्न मन उनका

उनकी शुभ आशिष लूँगी ।

पर जब उनकी वह प्रतिभा

नयनो से देखी जाकर,

तब छिपा लिया अञ्चल में

उपहार हार सकुचा कर ।

मैले कपड़ों के भीतर

तण्डुल जिसने पहचाने,

वह हार छिपाया मेरा

रहता कब तक अनजाने ?

मैं लज्जित मूक खड़ी थी,

प्रभु ने मुस्करा बुलाया,

फिर खड़े सामने मेरे

होकर निज शीश झुकाया !

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