निजी क्षेत्र की सहभागिता
भारत में आवश्यक दवा निर्माण के लिए अधिकतर कच्चा माल चीन से आयात किया जाता है। आवश्यक दवाओं की सूची में शामिल दर्जनों ऐसी हैं जिन्हें तैयार करने के लिए जरुरी 80 से 90 प्रतिशत कच्चा माल चीन से आता है। जो देश 50 से अधिक देशों को दवा की आपूर्ति करता हो, उसके आधे से अधिक दवा निर्माता कच्चे माल के लिए किसी अन्य देश पर निर्भर हों, इससे ख़तरनाक स्थिति कोई नहीं हो सकती। सरकार स्वास्थ्य के क्षेत्र में विदेशों पर भारत की निर्भरता कम करने की लगातार कोशिश कर रही है।
सोमवार को एक वेबिनार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि स्वास्थ्य क्षेत्र में उद्यमशीलता को बढ़ावा देने के लिए उनकी सरकार द्वारा उठाए गए विभिन्न उपायों को देखते हुए हमारे उद्यमियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि भारत को किसी भी प्रौद्योगिकी का आयात न करना पड़े और वह आत्मनिर्भर बने। प्रधानमंत्री ने कहा कि उनकी सरकार केवल स्वास्थ्य देखभाल पर ही नहीं, बल्कि नागरिकों के पूर्ण कल्याण पर ध्यान दे रही है।
भारत में इलाज को किफायती बनाना उनकी सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता रही है और आयुष्मान भारत के तहत पांच लाख रुपए तक के मुफ्त इलाज की सुविधा देने के पीछे यही भाव है। दुनिया के सामने हमने ‘‘एक पृथ्वी-एक स्वास्थ्य’’ का दृष्टिकोण पेश किया है।
भारत दशकों से स्वास्थ्य क्षेत्र में एकीकृत दृष्टिकोण व दीर्घकालिक नजरिये की कमी से जूझ रहा था, लेकिन मौजूदा केंद्र सरकार ने इसे केवल स्वास्थ्य मंत्रालय तक ही सीमित नहीं रखा बल्कि ‘‘संपूर्ण सरकार’’ का नजरिया बनाया। स्वास्थ्य क्षेत्र में बाजार का आकार चार लाख करोड़ का है। अगर इसमें निजी क्षेत्र और शैक्षणिक क्षेत्र के साथ तालमेल हो जाए तो यह क्षेत्र 10 लाख करोड़ को भी पार कर सकता है।
स्वास्थ्य प्रणाली में सुधार के लिए नवीनतम प्रौद्योगिकी का उपयोग किया जाना चाहिए। भारत की बड़ी आबादी के कारण बोझ से दबे सरकारी अस्पतालों के बुनियादी ढांचे में सुधार की तत्काल आवश्यकता है। इस क्षेत्र में कठिनाइयां अधिक हैं। केवल सरकार द्वारा ही इसका समाधान नहीं किया जा सकता है, निजी क्षेत्र को भी इसमें शामिल होना चाहिए। सरकार को निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है, क्योंकि ये महत्वपूर्ण योगदान प्रदान करते हैं। निजी क्षेत्र की अधिक भागीदारी कैसे हो इस पर मिलकर काम की आवश्यकता है।
