न हैं जख्मों के निशाँ, बस सिसकती साँसेः ऋतु गोड़ियाल
न हैं जख्मों के निशाँ
बस सिसकती साँसे
और शून्य में तकती आंखें
बड़ी गहरी मोहब्बत रही
जो बढ़ रही है दर्द के साथ
जगा रही जान छोड़ते जिस्म को
कर रही मनुहार मर रही ख्वाहिशों का
देखो ना प्रियतम मेरे
तुम और मैं कत्ल हो रहे हैं .....
पर अब भी तुम्हारी छुअन
मुझे छू रही है
तुम्हारी आवाज मेरे कानों में
प्रेम गीत गुनगुना रही है
मैं हौले हौले मर रही हूं
पर सही मायनों में कुछ लम्हे जी रही हूं
सुनो .......
जिंदगी के उस पार
मौत के संसार में
मैं तुम्हें पा लूंगी क्योंकि
तब मैं सिर्फ मैं होउंगी
और तुम सिर्फ तुम
हमारे अहं से परे
दुनियादारी से आगे
एक दूसरे में विलीन
तो फिर यह खूब रहा
कि तुम और मैं कत्ल हो रहे हैं.....।।
ऋतु गोड़ियाल
