नवरात्रि अखंड ज्योति नियम और विधान

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Published By Anjali Singh
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हिंदू धर्म में अग्नि को साक्षी मानकर धार्मिक कार्य करने की परंपरा है। नवरात्रि के दौरान भी जो अखंड ज्योति हम जलाते हैं वह आपके संकल्प, व्रत, पूजा और सभी धार्मिक अनुष्ठानों की साक्षी होती है। साथ ही यह माता के प्रति भक्तों की साधना का भी प्रतीक होती है। अत्यंत पवित्र होने के कारण अखंड ज्योति को जलाने के कई लाभ होते हैं। कहते हैं कि इसे जलाने से हर प्रकार की नकारात्मकता दूर होती है और घर में सुख-शांति का प्रवेश होता है। अखंड ज्योति जलाने से घर का वातावरण भी शुद्ध होता है और समृद्धि में वृद्धि होती है।-डॉ. विपिन शर्मा, ज्योतिषाचार्य

अखंड ज्योति की स्थापना विधि

जो चौकी आपने माता की प्रतिमा के लिए स्थापित की थी, उसी पर अखंड ज्योत की भी स्थापना की जाएगी। अखंड ज्योति की स्थापना के लिए सबसे पहले अष्टदल यानी आठ पंखुड़ियों वाले फूल का आसन बनाएं। आप चाहें तो अक्षत को हल्दी या लाल रंग से रंग भी सकते हैं। इस अष्टदल को आप सीधे चौकी पर भी बना सकते हैं और किसी पात्र में भी बनाकर, उसके ऊपर भी अखंड ज्योत स्थापित कर सकते हैं। अब इस अष्टदल पर दीपक को रखें। आप अखंड ज्योत जलाने के लिए मिट्टी या फिर तांबे के दीपक का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके बाद आप दीपक में बाती डालें और गाय का शुद्ध घी डालें। घी के अलावा आप शुद्ध तिल के तेल का भी उपयोग कर सकते हैं।  ऐसी मान्यता भी है कि अगर दीपक घी का है तो उसे माता के दाएं तरफ जलाया जाता है और अगर दीपक तेल का हो तो उसे बाएं ओर जलाया जाता है। अगर आप मिट्टी के दीपक का प्रयोग कर रहे हैं तो इस बात का ध्यान रखें कि उसमें बाती का मुख माता की तरफ यानी पूर्व दिशा में होना चाहिए। अगर दीपक तांबे का है तो उसमें बाती का मुख हमेशा सीधा ही होता है।

अखंड ज्योति मंत्र

भो दीप देवस्वरुपस्त्वं कर्म साक्षी सविघ्नकृत।  यावत्कर्म समाप्तिः स्यात् तावत्वं सुस्थिरो भव॥ अर्थात् जब तक व्रत समाप्त न हो, तब तक आप स्थिर रहे। इस प्रकार पूजन स्थल पर अखंड ज्योत प्रज्वलित हो जाएगी। अब आप दीपक को तिलक लगाएं और उन्हें अक्षत, पुष्प, रोली, मौली और भोग अर्पित करें। साथ ही आप अपनी भूल चूक के लिए माफी मांगे और उनसे यह प्रार्थना करें कि वह इसी प्रकार नौ दिनों तक जलते रहें। माता जी से भी दीपक की रक्षा की प्रार्थना करें। बाती की लंबाई का भी विशेष ध्यान रखें, यह इतनी बड़ी होनी चाहिए कि नौ दिनों तक निरंतर जलती रहे। कहते हैं कि अखंड ज्योत में सवा हाथ की बाती का प्रयोग करना चाहिए यानी उसकी लंबाई आपके हाथ से लेकर कोहनी के थोड़ा ऊपर तक होनी चाहिए।

भूलवश दीपक बुझ जाए तो क्या करें

हमें यथाशक्ति दीपक को जलाए रखने का प्रयास करना चाहिए। यदि फिर भी वह बुझ जाए तो माता रानी से क्षमा मांगकर अखंड ज्योत को दोबारा प्रज्वलित कर लेना चाहिए। इसके बाद देवी अपराध क्षमापन स्तोत्र का पाठ कर लेना चाहिए। माता रानी तो जग जननी हैं, वह अपने भक्तों द्वारा अनजाने में हुई गलतियों को क्षमा कर देती हैं।

क्या हैं नियम

आप अगर मिट्टी का दीपक जला रहे हैं तो यह जरूर सुनिश्चित कर लें कि वह दीपक खंडित न हो। ऐसा माना जाता है कि टूटे हुए दीपक को जलाने से घर में दरिद्रता आती है। अखंड ज्योति की स्थापना के बाद रोज माता के साथ दीपक का भी पूजन करें। पूजा के समय अखंड ज्योत को भी पूजन सामग्री और भोग अवश्य अर्पित करें। इसके साथ ही, इस बात का भी विशेष ध्यान रखें कि एक बार अखंड ज्योत जलाने के बाद घर को पूरी तरह से बंद नहीं करना होता है। साथ ही अखंड ज्योति जलाने के बाद घर में किसी न किसी सदस्य का होना जरूरी होता है। अगर आप अकेले रहते हैं या फिर काम से बाहर जाते हैं तो किसी मंदिर में इसका स्थापना करवा सकते हैं, लेकिन इसे अकेला कदापि न छोड़ें।

पौराणिक कथा

एक बार देवताओं और दैत्यों में भयंकर युद्ध छिड़ गया। इस युद्ध में देवता विजयी हुए। युद्ध जीतने से उनके मन में अहंकर उत्पन्न हो गया। सभी देवता स्वयं को तीनों लोकों में सबसे श्रेष्ठ मानने लगे। जब माता दुर्गा ने देवताओं को इस प्रकार अहंकार से ग्रस्त होते हुए देखा तो वे तेजपुंज के रूप में देवताओं के समक्ष प्रकट हुईं। माता का इतना विराट तेजपुंज रूप देखकर देवता भी घबरा गए। तेजपुंज का रहस्य जानने के लिए इंद्रदेव ने वायुदेव को भेजा। अहंकार में चूर होकर वायुदेव तेजपुंज के समीप पहुंचे। तेज ने उनसे उनका परिचय पूछा। वायुदेव ने कहा स्वयं को प्राणस्वरूप तथा अतिबलवान देव बताया। तेजस्वरूप माता ने वायुदेव के सामने एक तिनका रखा और कहा कि यदि तुम सचमुच इतने श्रेष्ठ और बलवान हो तो इस तिनके को उड़ाकर दिखाओ। समस्त शक्ति लगाने के बाद भी वायुदेव उस तिनके को हिला तक नहीं पाए। वायुदेव ने वापस आकर यह बात इंद्र को बताई। तब इंद्र ने अग्निदेव को उस तिनके को जलाने के लिए भेजा, लेकिन अग्निदेव की असफल रहे। यह देख इंद्रदेव का अभिमान चूर-चूर हो गया। इसके उपरांत उन्होंने उस तेजपुंज की उपासना की तब तेजपुंज से माता शक्ति का स्वरूप प्रकट हुआ। माता ने इंद्र को बताया कि मेरी ही कृपा से ही देवताओं ने असुरों पर विजय प्राप्त की है। इस प्रकार झूठे अभिमान में आकर तुम सब देवता अपना पुण्य नष्ट मत करो। देवी के वचन सुनकर सभी देवताओं को अपनी गलती का अहसास हुआ और सभी ने मिलकर मां दुर्गा की उपासना की।

 

 

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