कहानी : सबसे बड़ा धन आत्मविश्वास
प्रमोद श्रीवास्तव/ एक बार की बात है, एक बहुत ही प्रसिद्ध चित्रकार एक चौराहे पर खड़े होकर लोगों को अपनी कला दिखा रहा था। तभी वहां एक फटे-पुराने कपड़ों में एक भिखारी आया। भिखारी ने चित्रकार से कुछ खाने के लिए पैसे मांगे। चित्रकार के पास उस समय पैसे नहीं थे, लेकिन उसने अपनी जेब से एक सफेद लिफाफा निकाला और भिखारी को दे दिया। उसने कहा, “मेरे दोस्त, अभी मेरे पास धन नहीं है, लेकिन इस लिफाफे को संभाल कर रखना। जब तुम्हें लगे कि तुम्हारे पास खोने को कुछ नहीं बचा, तब इसे खोलना।”
भिखारी को बहुत गुस्सा आया। उसने सोचा, “इस कागज के टुकड़े से मेरा पेट कैसे भरेगा?” उसने लिफाफे को अपनी झोली में डाल लिया और उसे भूल गया। कुछ साल बीत गए। एक भीषण सर्दी की रात में भिखारी भूख और ठंड से बेहाल एक पुरानी इमारत के नीचे बैठा था। उसे लगा कि आज उसकी आखिरी रात है। अचानक उसे अपनी फटी हुई झोली में वह पुराना, मुड़ा-तुड़ा लिफाफा मिला। उसे चित्रकार की बात याद आई। जैसे ही उसने लिफाफा खोला, उसके अंदर से कोई कीमती सिक्का या नोट नहीं निकला, बल्कि एक छोटा सा दर्पण (शीशा) और एक कागज का टुकड़ा निकला जिस पर लिखा था,“दुनिया तुम्हें वह देख रही है, जो तुम बाहर से दिख रहे हो, लेकिन तुम वही बनोगे जो तुम इस आईने में देखोगे।”
भिखारी ने कांपते हाथों से उस आईने में अपना चेहरा देखा। सालों से उसने खुद को नहीं देखा था। उसने देखा कि उसकी आंखों में अभी भी एक चमक है, उसके हाथों में काम करने की शक्ति है। उसे अहसास हुआ कि उसने खुद को ‘भिखारी’ मान लिया था, इसलिए दुनिया उसे भिखारी देख रही थी। अगली सुबह, उसने भीख मांगने के बजाय पास के एक ढाबे पर जाकर बर्तन धोने का काम मांगा। उसने अपनी सफाई पर ध्यान दिया, मेहनत की और धीरे-धीरे एक छोटा सा काम शुरू किया।
सालों बाद, वह व्यक्ति खुद एक सफल व्यापारी बना। एक दिन वह उसी पुराने चित्रकार से मिला (जो अब काफी वृद्ध हो चुका था)। उसने चित्रकार को धन्यवाद देते हुए कहा,“उस खाली लिफाफे ने मुझे वह दिया जो सोने की मोहरें भी नहीं दे पातीं उसने मुझे 'मैं' से मिलवाया।” कहानी की सीख- हमारी परिस्थिति वैसी ही बनी रहती है, जैसा हम खुद के बारे में सोचते हैं। जब आप खुद का सम्मान करना शुरू करते हैं, तो दुनिया का आपके प्रति नजरिया अपने आप बदल जाता है। आत्मविश्वास ही सबसे बड़ा धन है।
