पौराणिक कथा : देवयानी और कच
शिवानंद मिश्रा/ कच और देवयानी का कथानक अत्यंत प्रसिद्ध है। कच देवगुरु बृहस्पति के पुत्र थे। देवताओं के अनुरोध पर वे दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य के पास संजीवनी विद्या सीखने गए। देवयानी, शुक्राचार्य की पुत्री, कच से प्रेम करने लगी। कच भी आचार्य और उनकी पुत्री की नित्य सेवा करते, गायन-वादन द्वारा देवयानी को प्रसन्न रखते थे। जब कच का अध्ययन पूर्ण हुआ और शुक्राचार्य ने उन्हें देवलोक जाने की आज्ञा दी, तब देवयानी ने अपने प्रेम का निवेदन करते हुए उनसे विवाह का आग्रह किया।
कच ने उत्तर दिया कि गुरु की पुत्री होने के कारण वह उनके लिए पूजनीय बहन के समान है, अतः यह संबंध धर्म के विरुद्ध है। देवयानी ने तर्क दिया कि कच उसके पिता के नहीं, गुरु के पुत्र हैं, इसलिए भाई नहीं लगते। फिर भी कच ने धर्म का पालन करते हुए प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। इससे क्रोधित होकर देवयानी ने कहा कि उसने कच को बार-बार मृत्यु से बचाया है, इसलिए वह उसके प्राणों पर अधिकार रखती है। उसने शाप दिया कि कच की सीखी हुई विद्या निष्फल हो जाए। कच ने शांत भाव से उत्तर दिया कि वह धर्म नहीं त्याग सकता और शाप स्वीकार करता है, पर प्रत्युत्तर में उसने भी शाप दिया कि देवयानी का यह प्रेम विवाह में सफल नहीं होगा।
कच को मारने के लिए असुरों ने अनेक बार प्रयास किए। हर बार शुक्राचार्य की संजीवनी विद्या और देवयानी के आग्रह से वह जीवित हो उठता। अंततः असुरों ने कच को मारकर उसका भस्म शुक्राचार्य को खिला दिया। तब कच को जीवित करने का एकमात्र उपाय था स्वयं शुक्राचार्य का जीवन त्यागना। परिस्थिति को समझकर शुक्राचार्य ने पहले कच को अपने भीतर से जीवित किया और उसे संजीवनी विद्या सिखाई।
फिर कच ने उनका उदर फाड़कर बाहर आकर उसी विद्या से उन्हें पुनः जीवित कर दिया। इसके बाद शुक्राचार्य ने कच को शाप दिया कि वह इस विद्या का स्वयं प्रयोग नहीं कर सकेगा। कच ने उत्तर दिया कि वह इसे दूसरों को सिखा देगा। अंततः कच गुरु की आज्ञा लेकर देवलोक लौट गया और अपनी विद्या से देवताओं का उद्देश्य पूर्ण किया।
