मदरसों को शैक्षणिक मानकों से खिलवाड़ करने का लाइसेंस नहीं: हाईकोर्ट
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गोरखपुर स्थित मदरसे में नीति विरुद्ध हुई नियुक्तियों पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए स्पष्ट किया कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 30(1) के तहत अल्पसंख्यकों को अपने शैक्षणिक संस्थान स्थापित और संचालित करने का अधिकार अवश्य है, लेकिन यह अधिकार शैक्षणिक उत्कृष्टता सुनिश्चित करने और शिक्षा के मानकों को बनाए रखने के लिए बनाए गए सरकारी नियमों से मुक्त होने का लाइसेंस नहीं है।
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकलपीठ ने गोरखपुर स्थित मदरसा अरबिया शम्शुल उलूम, सिकरीगंज एहता नवाब प्रबंध समिति की याचिका को स्वीकार करते हुए की, साथ ही प्रबंधक द्वारा सहायक अध्यापक के पांच और लिपिक के एक पद पर नियुक्ति हेतु जारी विज्ञापन को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जब सरकार ने शिक्षकों की योग्यता तय करने के लिए नई नीति और शासनादेश जारी किए थे, तब उनके लागू होने से पहले नियुक्तियों का विज्ञापन प्रकाशित करना कानून की दृष्टि में अनुचित और असंवैधानिक है। दरअसल मदरसे की प्रबंध समिति के चुनाव को लेकर पहले से विवाद था।
कोर्ट को बताया गया कि अभ्यावेदन के बावजूद चयन प्रक्रिया रोकी नहीं गई और शासनादेश का पालन करने के बजाय पुरानी प्रक्रिया के अनुसार विज्ञापन पर कार्यवाही जारी रखी गई। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन में अल्पसंख्यक कल्याण एवं वक्फ विभाग ने 14 मई 2025 की अधिसूचना और 25 अप्रैल 2025 के शासनादेश के माध्यम से शिक्षकों की योग्यता पुनः निर्धारित करने के निर्देश दिए थे, जिसके अनुपालन में सचिव, उत्तर प्रदेश ने 20 मई 2025 को निर्देश जारी किया, जिसे रजिस्ट्रार, उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा बोर्ड ने 23 मई 2025 के आदेश द्वारा सभी मदरसों में “नए निर्देश जारी होने तक शिक्षकों की नियुक्ति पर रोक” लगाने के लिए अग्रेषित किया। यह आदेश सभी संस्थानों के प्रधानाचार्यों और प्रबंधकों को पालन हेतु भेजा गया था।
कोर्ट ने पाया कि उक्त संस्थान के प्रबंधक सहित सभी को नोटिस दिए जाने के बावजूद सरकार की नीति के विरुद्ध विज्ञापन प्रकाशित किया गया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि प्रबंधक ने न केवल सरकारी आदेशों की अवहेलना की, बल्कि न्यायिक निर्देशों का भी उल्लंघन किया। अतः कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि कोई भी व्यक्ति, जिसकी नियुक्ति उपरोक्त विज्ञापन के अनुसार की गई है, वह ऐसी अवैध नियुक्ति पर किसी विधिक अधिकार का दावा नहीं कर सकता।
कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि अनुच्छेद 30(1) के तहत प्रदत्त अधिकार “तर्कसंगतता और सरकारी नीति के अधीन” हैं। इस आधार पर कोर्ट ने निष्कर्ष निकला कि विवादित विज्ञापन के आधार पर की गई सभी नियुक्तियां “स्वयं में अवैध” मानी जाएंगी और ऐसे नियुक्त व्यक्तियों को कोई सुनवाई या आपत्ति का अधिकार नहीं होगा।
