देश में वन क्षेत्र 25 % से अधिक होने से कार्बन निस्तारण 2.29 बिलियन बढ़ा, 2005 से 2021 के बीच देश के क्षेत्रफल का 25.17 प्रतिशत हुआ वनाच्छादित
लखनऊ, अमृत विचार : महान वैज्ञानिक प्रो. बीरबल साहनी की 134वीं जयंती के अवसर पर बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान ने स्थापना दिवस मनाया। इस अवसर पर 67वां सर ए. सी. सीवार्ड स्मृति व्याख्यान आयोजित किया गया। मुख्य अतिथि डॉ. एल.एस. राठौर ने "जलवायु परिवर्तन: शमन और अनुकूलन" विषय पर अपना व्याख्यान देते हुए कहा कि ग्रीनहाउस गैसों की सांद्रता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2005 तक वायुमंडलीय कार्बन डाईऑक्साइड का स्तर पिछले 6,50,000 वर्षों की प्राकृतिक सीमा से ऊपर पहुंच चुका था।
डॉ. राठौर ने यह भी बताया कि भारत का वन एवं वृक्षावरण लगातार बढ़कर उसके भौगोलिक क्षेत्र के 25.17 प्रतिशत तक पहुंच गया है। इस वृद्धि के परिणामस्वरूप वर्ष 2005 से 2021 के बीच 2.29 बिलियन टन अतिरिक्त कार्बन डाईऑक्साइड का प्राकृतिक निस्तारण संभव हुआ है। उन्होंने ऊर्जा दक्षता, नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग, जलवायु-अनुकूल प्रौद्योगिकियों के विकास और प्राकृतिक कार्बन सिंक को सुदृढ़ करने के साथ-साथ वैश्विक सहयोग की आवश्यकता पर बल दिया।
अपने संबोधन में निदेशक प्रो. महेश जी. ठक्कर ने प्रो. बीरबल साहनी की वैज्ञानिक विरासत पर प्रकाश डाला और संस्थान के अनुसंधान क्षेत्रों तथा हालिया वैज्ञानिक उपलब्धियों का विस्तार से उल्लेख किया। उन्होंने बीएसआईपी के संग्रहालय में संरक्षित सूक्ष्म एवं वृहद जीवाश्मों को एक राष्ट्रीय धरोहर बताते हुए कहा कि प्रत्येक जीवाश्म पृथ्वी के अतीत के पर्यावरण की कहानी कहता है।
कार्यक्रम में बीएसआईपी के निदेशक प्रो. महेश जी. ठक्कर, आईएमडी के पूर्व महानिदेशक डॉ. एल.एस. राठौर, विशिष्ट अतिथि डॉ. एस.एस. राठौर (भूविज्ञान विभाग, जेएनवी विश्वविद्यालय, जोधपुर), डॉ. एस.सी. माथुर, प्रो. मरी गिंग्रास (अल्बर्टा विश्वविद्यालय, कनाडा), तथा डॉ. अनुपम शर्मा, वरिष्ठ वैज्ञानिक, बीएसआईपी एवं आरडीसीसी सदस्य द्वारा बीएसआईपी की वार्षिक रिपोर्ट का विमोचन किया गया।
55वां बीरबल साहनी स्मृति व्याख्यान
कनाडा के अल्बर्टा विश्वविद्यालय के प्रो. मरी गिंग्रास ने 55वां बीरबल साहनी स्मारक व्याख्यान दिया, जिसका शीर्षक था-"पदचिह्नों से फेशिज तक: इकनोलॉजी की व्यावहारिक शक्ति"। उन्होंने बताया कि इकनोलॉजी—सूक्ष्म जीवाश्मों के अध्ययन के माध्यम से—यह समझने में मदद करती है कि प्राचीन जीव तलछटों के साथ कैसे अंतःक्रिया करते थे और उनके भोजन, निवास, पलायन तथा गति जैसे व्यवहारों का वैज्ञानिक रूप से दस्तावेजीकरण करती है। उन्होंने कहा कि सूक्ष्म जीवाश्म पारिस्थितिकी तंत्र की ऊर्जा, जैव-विक्षोभ पैटर्न और अतीत के पर्यावरणीय तनाव स्तरों की महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं।
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