संपादकीय: हवा की दवा करें

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Published By Monis Khan
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धरती पर सबसे जहरीली हवा हमारी राजधानी की है। यह न केवल देश की, बल्कि वायु प्रदूषण की वैश्विक राजधानी बन गई है। इसका वायु प्रदूषण स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक से 20 गुना होना दर्शाता है कि स्थिति बेलगाम है। हर साल अक्तूबर से फरवरी तक राजधानी की जहरीली हवा पर खबरों का तकरीबन रोज़ाना रिपीट होना इस बात का प्रमाण है कि इस स्थिति के प्रति हम महज़ बयानबाज़ी और खानापूरी तक सीमित हैं।

समस्या के समूल समाधान के प्रति  हमारी व्यवस्था में व्यापक अकर्मण्यता और पर्याप्त उदासीनता व्याप्त है। इसका सबूत है कि डब्ल्यूएचओ ने जब 2016 में दुनिया के सबसे 15 प्रदूषित शहरों की सूची जारी की, तो दिल्ली अव्वल थी। आज 2025 में भी हालात कमोबेश वही हैं। आज सर्वाधिक वायु प्रदूषण वाले 183 देशों में हमारा स्थान 177वां है। यह धारणा बलवती है कि दिल्ली या बड़े औद्योगिक शहरों की हवा ही ज़हरीली है और बाकी जगहें अपेक्षाकृत दुरुस्त हैं, पर ऐसा नहीं है। बरेली, मुरादाबाद, लखनऊ, अयोध्या जैसे तमाम शहरों के लोग वायु गुणवत्ता सूचकांक के 200 के आसपास की हवा में जी रहे हैं, जो बहुत अस्वास्थ्यकर है। 

वे यह सोच भी नहीं सकते कि कभी वायु प्रदूषण से ग्रस्त नार्वे के ओस्लो का औसत एक्यूआई 1–2 तक, ऑटो इंडस्ट्री के चलते कभी कुख्यात डेट्रॉइट का 8 और भारी वाहन यातायात व औद्योगिक गतिविधियों के लिए जाना जाने वाला अल्जीयर्स का 11 भी हो सकता है। सरकार हो या समाज, यह लापरवाही आत्मघाती है। इससे पहले कि वातावरण दमघोंटू हो जाए और सवा दशक पहले के बीजिंग, हेबेई और तिआनजिन जैसे शहरों की तरह अस्पतालों के बेड वायु प्रदूषण प्रभावितों से भर जाएं, लोग कैन या पाउच में अपनी साफ हवा लेकर चलें और खास तरह के मास्क व पोर्टेबल ऑक्सीजन कैन जैसे उत्पादों वाला ‘प्रदूषण बाज़ार’ लोगों को बेज़ार करे, हमें इस समस्या का स्थायी हल खोजना होगा। तय है कि पानी का छिड़काव, कृत्रिम बारिश या कुछ समय के लिए वाहनों पर रोक जैसे अस्थायी समाधान इस जहरीली हवा की अकसीर दवा नहीं बन सकते। हमें दीर्घकालिक, संरचनात्मक उपाय करने होंगे।

बहुत से देशों और शहरों ने अपने वायु गुणवत्ता सूचकांक को सैकड़ों से सतत प्रयासों के जरिए दहाई तक ला दिया। क्या हमें उनसे सीख लेकर वैसे ही उपाय अपनाने चाहिए, या अपनी व्यवस्था, समाज और मिज़ाज के अनुरूप समाधान तलाशने होंगे? यूरोपीय देशों या शहरों की बजाय हमारे लिए चीन एक अधिक उपयुक्त मॉडल लगता है, क्योंकि दोनों के लिए विकास और शहरीकरण वायु प्रदूषण के समान कारक हैं। उसने दीर्घ अवधि की नीतियों और त्वरित क्रियाओं का संयोजन लागू किया है। चीन ने इस बाबत सहयोग की पेशकश भी रखी है। संभव है सरकार सीमा विवाद को परे रख इस मामले में सहयोग की पहल करे। कुछ भी हो वर्तमान में जब सांस दर सांस भारी होती जा रही है, ऐसे में ऐसी भयावह स्थिति में सबसे ज़रूरी है कि साफ हवा के लिए जन-जागरूकता बढ़े और सरकार वोट का मुद्दा न होने के बावजूद इससे निबटने का पूरी ईमानदारी से स्थायी प्रयास करे।