काशी से पर्यावरण के लिए वरदानः आईआईटी बीएचयू ने बनाया सस्ता 'रासायनिक स्पंज', 99% तक डाई प्रदूषण खत्म

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Published By Muskan Dixit
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वाराणसीः भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (काशी हिंदू विश्वविद्यालय) के शोधकर्ताओं ने औद्योगिक अपशिष्ट जल से विषैले रासायनिक रंगों को प्रभावी रूप से हटाने के लिए एक अत्यंत दक्ष, टिकाऊ एवं कम लागत वाला एडसॉर्बेंट (शोषक पदार्थ) विकसित किया है।

इस अनुसंधान का नेतृत्व प्रो. चंदन उपाध्याय एवं अमित बार (स्कूल ऑफ मटेरियल्स साइंस एंड टेक्नोलॉजी) ने किया, जबकि डॉ. राम शरण सिंह (रसायन अभियांत्रिकी विभाग) ने इसमें महत्वपूर्ण योगदान दिया। यह शोध वस्त्र, प्रिंटिंग एवं औषधि उद्योगों से निकलने वाले अनुपचारित रासायनिक रंगों के जल स्रोतों में बड़े पैमाने पर निर्वहन जैसी गंभीर पर्यावरणीय समस्या का समाधान प्रस्तुत करता है। वस्त्र उद्योग भारतीय अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख स्तंभ है, लेकिन इससे प्रतिवर्ष अरबों लीटर अपशिष्ट जल उत्पन्न होता है, जिसमें खतरनाक एज़ो डाई पाए जाते हैं। ये रसायन न केवल हटाने में कठिन होते हैं, बल्कि मानव स्वास्थ्य एवं जलीय जीवन के लिए भी गंभीर खतरा उत्पन्न करते हैं।

आईआईटी बीएचयू की शोध टीम ने लेयर्ड डबल हाइड्रॉक्साइड्स (एलडीएच) आधारित एक उन्नत शोषक पदार्थ विकसित किया है, जो रासायनिक स्पंज की तरह कार्य करता है। यद्यपि एडसॉर्प्शन विधि को जल शोधन के लिए कम लागत वाला समाधान माना जाता है, परंतु अब तक उपलब्ध सामग्रियों में या तो दक्षता कम थी या उनका निर्माण अत्यधिक महंगा था। यह नई तकनीक इन दोनों चुनौतियों का प्रभावी समाधान प्रस्तुत करती है। यह उन्नत तकनीक कॉन्गो रेड और मिथाइल ऑरेंज जैसे खतरनाक प्रदूषकों को 85 प्रतिशत से 99 प्रतिशत तक प्रभावी रूप से हटाने में सक्षम है। निकल अथवा जिंक आधारित विशिष्ट धातु संयोजन के अनुसार, यह एडसॉर्बेंट प्रति ग्राम सामग्री 869.5 मिलीग्राम तक रंग सोखने की क्षमता रखता है।

शोधकर्ताओं के अनुसार, इस तकनीक से अपशिष्ट जल उपचार की अनुमानित लागत मात्र 9 पैसे प्रति लीटर है, जिससे यह बड़े पैमाने पर औद्योगिक उपयोग के लिए अत्यंत किफायती और व्यवहार्य समाधान बन जाती है। इस संबंध में जानकारी देते हुए प्रो. चंदन उपाध्याय ने बताया कि शोध टीम ने इस सामग्री के निर्माण हेतु एक सरल एवं व्यावहारिक विधि विकसित की है, जिसमें पूर्व प्रचलित तकनीकों की तरह महंगे और विशेष उपकरणों की आवश्यकता नहीं होती। सामान्य धातु नाइट्रेट्स एवं नियंत्रित ताप प्रक्रिया के उपयोग से यह तकनीक आर्थिक रूप से किफायती और पर्यावरण के अनुकूल बनती है।

आईआईटी (बीएचयू) के निदेशक प्रो. अमित पात्रा ने कहा, "आईआईटी (बीएचयू) वैश्विक और स्थानीय दोनों प्रकार की चुनौतियों के समाधान के लिए निरंतर प्रयासरत है। वस्त्र उद्योग से निकलने वाले रासायनिक रंगों का अनुपचारित निर्वहन न केवल वैश्विक वस्त्र उद्योग की समस्या है, बल्कि वाराणसी क्षेत्र के स्थानीय कालीन उद्योग से भी प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ है। यह नवाचार एक प्रभावी औद्योगिक समाधान के रूप में विकसित होने की प्रबल क्षमता रखता है।" 

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