यूपी बना संघ की बड़ी प्रयोगशाला, ढांचे में सर्जरी से मिलेगी नई दिशा... शुरू हुई 2027 में जीत की तैयारी
मोहल्लों तक सीधी पैठ से लेकर पसमांदा मुस्लिम रणनीति तक ढांचे में होगा बड़ा बदलाव
धीरेंद्र सिंह, लखनऊ, अमृत विचार: मथुरा के वृंदावन स्थित केशव धाम में हुई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की अखिल भारतीय कार्यकारिणी बैठक ने यह संकेत साफ कर दिया है कि उत्तर प्रदेश आने वाले वर्षों में संघ की सबसे बड़ी सामाजिक-राजनीतिक प्रयोगशाला बनने जा रहा है। 2027 के विधानसभा चुनाव को केंद्र में रखकर संघ ने संगठनात्मक ढांचे, सामाजिक रणनीति और भारतीय जनता पार्टी के साथ समन्वय, तीनों मोर्चों पर एक साथ हस्तक्षेप की विस्तृत रूपरेखा तैयार की है।
वृंदावन की यह बैठक बताती है कि संघ खुद को सिर्फ वैचारिक संगठन तक सीमित नहीं रखना चाहता, बल्कि सामाजिक–राजनीतिक दिशा तय करने वाली शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहता है। ढांचे की सर्जरी, ओबीसी-पसमांदा फोकस और भाजपा के साथ री-सेटेड रिश्ते, ये सभी 2027 की तैयारी की कड़ियां हैं। आने वाले महीनों में यूपी की गलियों और गांवों में संघ की बढ़ती मौजूदगी प्रदेश की राजनीति को नई दिशा दे सकती है। बैठक का सबसे अहम फैसला संघ के सांगठनिक ढांचे में प्रस्तावित बड़ा पुनर्गठन है। अब तक प्रांत स्तर पर सक्रिय प्रांत प्रचारकों की भूमिका में बदलाव कर उन्हें प्रदेश स्तर पर केंद्रित किया जाएगा, जबकि संभाग स्तर पर नए प्रचारकों की तैनाती होगी। इसका सीधा संदेश है कि संघ अब और नीचे, मोहल्लों, बस्तियों और गांवों तक सीधी पहुंच बनाना चाहता है। संघ पदाधिकारियों के अनुसार, बीते वर्षों में विस्तार के बावजूद कई क्षेत्रों में संपर्क शिथिल पड़ा है। नई व्यवस्था का उद्देश्य निष्क्रिय स्वयंसेवकों को फिर से सक्रिय करना और स्थानीय सामाजिक ताने-बाने में संघ की रोजमर्रा की मौजूदगी को मजबूत करना है। मार्च से देशभर में लागू होने वाली यह प्रणाली यूपी में प्राथमिकता के साथ जमीन पर उतरेगी।
ओबीसी के साथ सामाजिक समरसता का गणित
बैठक में संघ प्रमुख मोहन भागवत का संदेश स्पष्ट रहा कि हिंदुत्व को केवल प्रतीकों और आंदोलनों तक सीमित न रखकर शिक्षा, स्वास्थ्य और सेवा गतिविधियों के जरिए समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाया जाए। यूपी के संदर्भ में इसका अर्थ मंदिर-आंदोलन के पुराने फ्रेम से आगे बढ़कर सामाजिक नेटवर्क, सांस्कृतिक सक्रियता और सेवा कार्यों के जरिए हिंदू समाज को जोड़ना है। संघ के आकलन में ओबीसी वर्ग यूपी की राजनीति की निर्णायक धुरी है। संघ का मानना है कि सामाजिक-आर्थिक असंतुलन का राजनीतिक नुकसान अंततः भाजपा को उठाना पड़ सकता है, इसलिए ‘सामाजिक समरसता’ को हिंदुत्व की व्यापक अवधारणा से जोड़ा जा रहा है।
पसमांदा मुस्लिम रणनीति संवेदनशील लेकिन दूरगामी दांव
बैठक का सबसे संवेदनशील और चर्चित मुद्दा पसमांदा मुस्लिमों को लेकर बनी रणनीति रही। 5 जनवरी से शुरू हुई बैठक में 8 जनवरी को कोर ग्रुप बैठक में राष्ट्रीय मुस्लिम मंच के माध्यम से शिक्षा, कौशल विकास और सामाजिक संवाद पर केंद्रित योजनाओं को आगे बढ़ाने पर सहमति बनी। कारीगर, बुनकर और मजदूर तबके से जुड़े पसमांदा समाज को मुख्यधारा से जोड़कर मुस्लिम समाज के भीतर वैकल्पिक विमर्श खड़ा करने की कोशिश मानी जा रही है, जो राजनीतिक रूप से जोखिम भरी, लेकिन दूरगामी असर वाली रणनीति है।
2024 से सबक लेकर 2027 पर नजर
वृंदावन में भाजपा नेतृत्व के साथ हुई समन्वय बैठकों में संगठन महामंत्री बीएल संतोष सहित शीर्ष पदाधिकारी शामिल रहे। 2024 के लोकसभा चुनाव में लगे झटके के फीडबैक, फॉलो-अप और समन्वय पर खुली चर्चा हुई। संघ नेतृत्व का संदेश साफ है कि योगी आदित्यनाथ भाजपा का सबसे मजबूत चेहरा हैं, लेकिन नीतियों और फैसलों में सामाजिक संतुलन और संगठन की प्राथमिकताएं स्पष्ट दिखनी चाहिए। संगठन अब सरकार और पार्टी, दोनों के साथ निरंतर संवाद चाहता है।
