सिंधु सभ्यता के मुहरों में रामायण होने का दावा, बोले धनपत सिंह- कार्बन डेटिंग के शुरू होने से भी प्राचीन भारतीय उपमहाद्विप का इतिहास
मार्कण्डेय पाण्डेय, लखनऊ, अमृत विचार: कार्बन डेटिंग जहां कार्य नहीं करता उससे भी प्राचीन है भारतीय उपमहाद्विप का इतिहास, ये दावा भारतीय संस्कृति के विशेषज्ञ करते रहे हैं। इतिहासविद् धनपत सिंह धानिया ने इस दावे को सत्य साबित करने वाला शोध किया है। इस शोध ने इतिहास जगत में हलचल मचा दी है।
धानिया ने दावा किया है कि सिंधु घाटी सभ्यता की मुहरों पर अंकित प्रतिलिपि को पढ़ने पर रामायण के चिन्ह मिले हैं। इससे ये साबित होता है कि रामायण कालीन सभ्यता सिंधु घाटी की सभ्यता से भी प्राचीन है। प्राचीन इतिहासवेत्ता सिंधु घाटी सभ्यता का परिपक्व काल 2600 से 1900 ईसा पूर्व मानते हैं, जबकि अयोध्या की खुदाई आदि से मिले पुरातात्विक साक्ष्य रामायण काल को 1000 से 700 ईसा पूर्व के बीच रखते हैं। इस दृष्टी से सिंधु घाटी सभ्यता रामायण काल से भी अधिक प्राचीन मानी जाती रही है, लेकिन ताजा शोध ने इस तथ्य को चुनौती दे दी है।
द्विभाषी डिसिफर पद्धति से सिंधु लिपि को समझने का दावा करते हुए इतिहासविद् धनपत सिंह धानिया (एमए इतिहास, एमआईएएस, एमआईएचसी, एमडब्लयूएसी) ने कहा है कि हड़प्पा और मोहनजोदड़ो से प्राप्त सिंधु सभ्यता की मुहरों पर संपूर्ण रामायण अंकित है। उनका कहना है कि इन मुहरों की भाषा को संस्कृत के माध्यम से समझा जा सकता है और संस्कृत ही सिंधु भाषा की संपर्क भाषा रही है। लखनऊ विश्वविद्यालय के मानव शास्त्र विभाग में आयोजित कार्यक्रम में इतिहासकार धनपत ने यह खुलासा किया है।
दो प्रकार की मुहरें
सिंधु मुहरें मुख्य रुप से दो प्रकार की हैं। एक ओर लिखी हुई मुहरें और दोनों ओर लिखी हुई द्विभाषी मुहरें। एक ओर लिखी मुहरों के अग्रभाग पर सिंधु लिपि में शब्द अंकित हैं, जबकि पृष्ठभाग पर एक हत्थी (हैंडल) लगी होती है। जिससे कपड़े या अन्य सतहों पर छापा लगाया जाता था। इन मुहरों का उपयोग रोजमर्रा के व्यापार के लिए नहीं, बल्कि शिक्षा और अध्ययन सामग्री के रूप में विश्वविद्यालयों में किया जाता था। इसी आधार पर वे हड़प्पा और मोहनजोदड़ो को प्राचीन विश्वविद्यालय नगर मानते हैं। हालांकि ऐसे दावों की पुष्टि के लिए व्यापक शैक्षणिक समीक्षा और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृति आवश्यक है।
कालीदास के रघुवंश के चिंह भी मुहरों पर
खुदाई में मुहरें श्रृंखलाबद्ध रूप से प्राप्त हुई हैं, जिन्हें वे लिखित सामग्री के रूप में उपलब्ध अखंड और दीर्घग्रंथ का प्रमाण मानते हैं। वह बताते हैं कि कालिदास रचित रघुवंश महाकाव्य में वर्णित रामायण के प्रसंग सिंधु मुहरों पर भी क्रमबद्ध रूप से मिलते हैं, जिससे यह सिद्ध होता है कि सिंधु लिपि को संस्कृत के माध्यम से पढ़ा जा सकता है।
चित्रात्मक भाषा और शब्दात्मक भाषा
इन मुहरों के एक पक्ष पर चित्रात्मक भाषा और दूसरे पक्ष पर शब्दात्मक (सिंधु) भाषा अंकित है, जबकि दोनों का विषय एक ही होता है। उदाहरणस्वरूप, एक मुहर पर हाथी का चित्र जल को आगे बढ़ाते हुए दिखाया गया है, वहीं दूसरी ओर उसी भाव को व्यक्त करने वाला शब्द अंकित है। इसे वे चित्रात्मक और शब्दात्मक भाषा के सामंजस्य का प्रमाण मानते हैं।
