सूर्य की उपासना का पर्व मकर संक्रांति
कलयुग में पांच प्रत्यक्ष देवता है, जिनको हम अपने नेत्रों से साक्षात दर्शन कर सकते है- सूर्य, चंद, गंगा, यमुना और गोवर्धन पर्वत। इनमें सूर्य सबसे प्रमुख हैं। सूर्य तो सूर्य ही है, सूर्य सब ग्रहों का राजा है। सूर्य शास्वत है, सूर्य ही आत्मा है, पूरी सृष्टि सूर्य पर निर्भर है। सूर्य को सिंह राशि प्राप्त है। इस राशि में न कोई ग्रह उच्च का होता है और न ही कोई ग्रह नीच का होता है। सिंह राशि सूर्य का घर है। सूर्य सबसे अनुशासित ग्रह है। कभी किसी को भटकने नहीं देता। समय से उदय होगा और निश्चत समय पर ही अस्त होता है। सूर्य का छः माह उत्तर से दक्षिण और छः माह दक्षिण से उत्तर की ओर गमन रहता है, जिसे सूर्य का उत्तरायणी होना कहते हैं।– अशोक सूरी, आध्यात्मिक लेखक
सूर्य के राशि परिवर्तन को कहा जाता है संक्रांति
सूर्य सदा चलायमान ग्रह है, इसके सातों अश्व कभी विश्राम नहीं करते है। ज्योतिष के अनुसार 12 राशियां होती है और सूर्य प्रत्येक राशि में लगभग 1 माह विचरण करता है। सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में परिवर्तन को संक्रांति कहा जाता है। सभी राशियों में सूर्य अंग्रेजी कलेंडर की 12 से 17 तारीख के बीच राशि परिवर्तन करता है। सूर्य प्रतिदिन 24 घंटे में प्रत्येक राशि में भ्रमण करता है, परंतु सदैव 14 जनवरी (कभी-कभी 15 जनवरी) को मकर राशि में प्रवेश करता है। सूर्य ग्रह के मकर राशि में प्रवेश को ही मकर संक्रांति के रूप में मनाते हैं। मकर राशि का स्वामी शनि है। इससे पहले सूर्य बृहस्पति की राशि धनु राशि में विचरण करता है, जिसे खरमास कहते हैं। खरमास में शुभ कार्य करना वर्जित बताया गया है। जैसे ही सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है खरमास के बंधन समाप्त हो जाते हैं और मकर संक्रांति का शुभ पर्व प्रारंभ होता है। यह दिन सूर्य के उत्तराणी होने का संकेत है। मकर संक्रांति पर स्नान, दान एवं सूर्य को अघ्र्य देने की परंपरा है। खरमास एवं मकर संक्रांति से हम सीखते है कि जीवन में संयम व उत्सव अपने-अपने समय पर आवश्यक है।
संक्रांति के विभिन्न रूप
पौराणिक कथा के अनुसार इस दिन सूर्य देव अपने पुत्र शनि के घर (मकर राशि) मिलने जाते हैं, जो पिता-पुत्र के बीच संबंधों का प्रतीक भी है। भीष्म पितामाह ने अपना शरीर इसी दिन त्यागा था। उत्तरायणी सूर्य के समय शरीर त्यागने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है ऐसी हिन्दू धर्म की मान्यता है। गंगाजी का पृथ्वी पर आवतरण व भागीरथ द्वारा अपने पितरो का तर्पण भी इसी दिन हुआ था। भारत वर्ष के विभिन्न प्रांतों में यह त्योहार अलग-अलग रूपों में मनाया जाता है। उत्तर भारत में जहां एक ओर गंगा स्नान एवं खिचड़ी का महत्व है, वहीं दक्षिण भारत में पोंगल के रूप में मनाया जाता है। पश्चिमी भारत में पतंग उत्सव के रूप में मनाते हैं। पूर्वी राज्यों में इसे बिहू के रूप में मनाया जाता है, जिसमें सामुदायिक सदभाव और भोज का आयोजन किया जाता है। बंगाल में गंगा सागर का वर्ष में एक बार मनाया जाने वाला मेला भी इसी दिन लगता है। कहते है...“सारे तीर्थ बार-बार, गंगा सागर एक बार”। पंजाब में मकर संक्रांति से एक दिन पूर्व लोहड़ी का पर्व मनाया जाता है, इस उत्सव में भी तिल, गुड खाने व बांटने का विशेष महत्व है। मकर संक्र्रांति दान का भी पर्व है-इस दिन तिल, गुड, गर्म वस्त्र, खिचड़ी, गौदान आदि दान करने से पापो का क्षय होता है और सुख समृद्धि की वृद्धि होने की मान्यता है।
सकारात्मकता का संदेश
मकर संक्रांति का पर्व हमें “गुड़ तिल खाओ मधुर-मधुर बोलो” का संदेश समाज को देता है। वर्ष के आरंभ में आने वाला यह पर्व “सर्वे भवन्तु सुखिनाः” -सभी के सुंदर जीवन की कामना करता है। यह पर्व हमें सामाजिक रूप से जोड़ता है और आपसी सहयोग की भावना को मजबूत करता है। मकर संक्रांति के पश्चात समय धीरे-धीरे शुभता की ओर अग्रसर होता है। इस पर्व के उपरांत मौसम में परिवर्तन भी आने लगते हैं- शीत ऋ तु की वापसी और बसंत ऋ तु का आगमन होने लगता है। सूर्य के उत्तराणी होने से दिन बड़े होने लगते है और रात्रि छोटी होने लगती है। मकर संक्रांति का पर्व हमें सिखता है, जैसे सूर्य उत्तरायणी होकर प्रकाश बढ़ाता है- वैसे ही हमें अपने जीवन में सकारात्मकता बढ़ानी चाहिए।
