साहित्य जगत में शोक की लहर... विचारक, चिन्तक और प्रखर वक्ता वीरेन्द्र यादव का निधन

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Published By Muskan Dixit
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लखनऊ, अमृत विचार: हिन्दी साहित्य के प्रख्यात आलोचक वीरेन्द्र यादव का शुक्रवार सुबह दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। 76 वर्षीय यादव प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष थे।

5 मार्च 1950 को जौनपुर में जन्मे वीरेंद्र ने लविवि से राजनीति शास्त्र में एमए किया। छात्र जीवन में ही ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन के साथ पत्रकारिता से जुड़ गए। हिन्दी साहित्य के महत्वपूर्ण आलोचक, चिंतक वीरेंद्र साहित्य-समालोचना से सामाजिक-राजनीतिक विमर्श तक हर जगह मौजूद रहे। नवें दशक की शुरुआत में उन्होंने राकेश के साथ मिल कर प्रयोजन पत्रिका का संपादन किया। उनकी आलोचना मार्क्सवादी और प्रगतिशील संदर्भ में रही, जिसमें साहित्य समाज की सत्ता और अंतर्विरोधों को उजागर करने का माध्यम माना गया। उनकी रचनाएं केवल तकनीकी आलोचना तक सीमित न रहकर समाजिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक विमर्श को भी अपना विषय बनाती थीं।

वीरेन्द्र की रचनाएं हिन्दी साहित्य में आलोचनात्मक विमर्श को नई दिशा देने वाली मानी जाती हैं। आलोचना में उन्होंने पाठ, समाज, राजनीति और संस्कृति के बीच के गहन अंतर्संबंधों को प्रकट किया। उनके निधन से साहित्य-दुनिया ने एक महत्वपूर्ण चिंतक और मार्गदर्शक खो दिया है।

वीरेंद्र यादव के निधन की खबर फैलते ही साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गई। अनेक साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उनके घर इंदिरा नगर पहुंचकर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की। अनेक संगठनों ने उनके साहित्य, विचार और समाज में किए अप्रतिम योगदान को याद करते हुए शोक संवेदना प्रकट की। अंतिम संस्कार 17 जनवरी को पूर्वाह्न 11 बजे भैंसाकुंड के विद्युत शवदाह गृह में किया जाएगा। वीरेंद्र यादव अपने पीछे पत्नी, बेटा और बेटी छोड़ गए हैं।

जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कौशल किशोर, राष्ट्रीय पार्षद भगवान स्वरूप कटियार तथा लखनऊ इकाई के सचिव फरजाना महदी ने वीरेंद्र यादव के आकस्मिक निधन पर अपनी शोक संवेदना प्रकट करते हुए कहा कि साहित्य-समाज में उनकी भूमिका एक सांस्कृतिक कमांडर और पब्लिक इंटेलेक्चुअल की थी। फासीवादी दौर में वे अपनी प्रतिबद्धता, सरोकार और पक्षधरता के लिए हमेशा याद किए जाएंगे। हिन्दी की पारंपरिक व जड़ आलोचना की परंपरा से लड़ते हुए उन्होंने एक नई सृजनात्मक आलोचना विकसित की थी। प्रेमचन्द के तो वे विश्व कोश थे।

इप्टा के राकेश ने कहा कि दशकों पुराना दोस्त खो दिया। इप्टा, उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष राजेश श्रीवास्तव व सचिव शहजाद रिज़वी तथा प्रगतिशील लेखक संघ, लखनऊ के अध्यक्ष प्रोफेसर रीता चौधरी तथा सचिव इरा श्रीवास्तव ने अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि व्यक्त करते हुए कहा कि वीरेंद्र यादव का जाना हमारे लिए सदमे की तरह है। उन्होंने प्रगतिशील आंदोलन को नई ऊंचाई दी। इस आंदोलन के अगुआ थे। यह हमारे लिए दुख की घड़ी है। उनके पास एक स्पष्ट और प्रखर वैचारिक समझ थी।

उनकी अनेक चर्चित आलोचनात्मक पुस्तकें हैं। जिनमें उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता, उपन्यास और देश, प्रगतिशील साहित्य और आंदोलन पर केंद्रित पुस्तक प्रगतिशीलता के पक्ष में तथा विवाद नहीं हस्तक्षेप। प्रेमचंद और 1857 पर उनका लेखन हस्तक्षेपकारी है। वीरेंद्र यादव ने मारकंडे की संपूर्ण कहानी और यशपाल का विप्लव पुस्तकों की भूमिका भी लिखी। उनकी अंग्रेजी में एक पुस्तिका भी प्रकाशित हुई थी द रिवॉल्यूशन मिथ एंड रियलिटी। उन्हें कई सम्मानों से सम्मानित भी किया गया। देवी शंकर अवस्थी आलोचना सम्मान, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का साहित्य भूषण सम्मान, गुलाब राय सम्मान, शमशेर सम्मान और मुद्राराक्षस सम्मान से वे समादृत किए गए।

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