हाइकोर्ट : संदेह के आधार पर नहीं, सजा के लिए विश्वसनीय साक्ष्य आवश्यक
प्रयागराज, अमृत विचार : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने झांसी के एक अपहरण-दुष्कर्म मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सजा को निरस्त कर आरोपी को बरी करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने में असफल रहा और साक्ष्यों में मौजूद गंभीर विरोधाभासों को नजरअंदाज कर सजा देना न्यायोचित नहीं है। उक्त आदेश न्यायमूर्ति अचल सचदेव ने भगवत कुशवाहा की आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए कहा कि पीड़िता के अलग-अलग बयानों में निरंतरता का अभाव है।
मामले के अनुसार अभियुक्त के विरुद्ध सीआरपीसी की धारा 161 और 164 के तहत दर्ज पीड़िता के बयानों, चिकित्सकीय साक्ष्य और परिस्थितिजन्य तथ्यों को समग्र रूप से देखने पर अभियोजन की कहानी की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। अभियोजन के अनुसार पीड़िता का अपहरण कर उसके साथ दुष्कर्म किया गया। इस आधार पर ट्रायल कोर्ट ने 5 सितंबर 2019 को को आईपीसी की धारा 366 के तहत पांच वर्ष और धारा 376 के तहत दस वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। कोर्ट ने अपने फैसले में उल्लेख किया कि ट्रायल कोर्ट स्वयं पीड़िता को घटना के समय बालिग मान चुका था। ऐसे में सहमति का प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है, जिसे समुचित रूप से नहीं परखा गया।
रिकॉर्ड पर मौजूद परिस्थितियों से यह संभावना भी सामने आती है कि पीड़िता आरोपी के साथ अपनी इच्छा से गई थी। मामले में ट्रायल कोर्ट ने 5 सितंबर 2019 को अपीलकर्ता को आईपीसी की धारा 366 के तहत पांच वर्ष और धारा 376 के तहत दस वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। कोर्ट ने इस आदेश को रद्द करते हुए कहा कि यदि साक्ष्यों से दो संभावित निष्कर्ष निकलते हों, तो आरोपी के पक्ष में जाने वाला निष्कर्ष अपनाया न्यायोचित है। इन्हीं टिप्पणियों के साथ कोर्ट ने आरोपी को सभी आरोपों से बरी करते हुए स्पष्ट किया कि आपराधिक मामलों में केवल संदेह के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती, इसके लिए अभियोजन को ठोस व विश्वसनीय साक्ष्यों के जरिए अपराध सिद्ध करना अनिवार्य है।
