वैज्ञानिक फैक्ट: शहद के दीर्घायु होने का विज्ञान

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Published By Anjali Singh
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शहद एक ऐसा प्राकृतिक खाद्य पदार्थ है, जो सामान्य परिस्थितियों में वर्षों तक सुरक्षित रहता है और लगभग कभी खराब नहीं होता। इसके पीछे कोई चमत्कार नहीं, बल्कि उसकी विशिष्ट रासायनिक संरचना और प्राकृतिक गुण जिम्मेदार हैं। यही कारण है कि प्राचीन काल से शहद को न केवल भोजन, बल्कि औषधि के रूप में भी महत्व दिया जाता रहा है।शहद में पानी की मात्रा बेहद कम होती है। 

आमतौर पर इसमें नमी 16 से 18 प्रतिशत के बीच रहती है, जबकि अधिकांश बैक्टीरिया और फफूंद को जीवित रहने और बढ़ने के लिए कहीं अधिक नमी की आवश्यकता होती है। पानी की कमी के कारण सूक्ष्मजीव शहद में पनप नहीं पाते। इसके साथ ही शहद में शर्करा की मात्रा बहुत अधिक होती है, जो लगभग 80 प्रतिशत तक होती है। इतनी अधिक शर्करा के कारण उसमें ऑस्मोटिक दबाव बहुत ज्यादा होता है, जिससे बैक्टीरिया और फफूंद की कोशिकाओं से पानी बाहर खिंच जाता है और वे निष्क्रिय हो जाते हैं।

शहद की प्रकृति हल्की अम्लीय होती है। इसका pH सामान्यतः 3.2 से 4.5 के बीच रहता है। यह अम्लीय वातावरण अधिकांश रोगजनक सूक्ष्मजीवों के लिए अनुकूल नहीं होता, जिससे वे उसमें जीवित नहीं रह पाते। इसके अलावा शहद में प्राकृतिक जीवाणुरोधी तत्व भी पाए जाते हैं। मधुमक्खियां शहद बनाते समय उसमें ग्लूकोज़ ऑक्सीडेज नामक एंजाइम मिलाती हैं, जो नमी के संपर्क में आने पर हाइड्रोजन पेरॉक्साइड उत्पन्न करता है। यह पदार्थ बैक्टीरिया को नष्ट करने में सहायक होता है।

इतिहास में इसके प्रमाण भी मिलते हैं। मिस्र के पिरामिडों से हजारों वर्ष पुराना शहद प्राप्त हुआ है, जो आज भी सुरक्षित पाया गया। हालांकि यदि शहद में पानी मिल जाए, वह खुले या गीले बर्तन में रखा जाए या उसमें मिलावट हो, तो उसके खराब होने की संभावना बढ़ जाती है। सही ढंग से रखा गया शुद्ध शहद समय की कसौटी पर खरा उतरता है और प्रकृति का एक अनोखा, दीर्घजीवी खाद्य पदार्थ साबित होता है।

 

 

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