कैंपस में पहला दिन: सीख और स्मृतियों की यात्रा
इंटर की परीक्षा पास करते ही जीवन ने मुझे पहली बार घर की सीमाओं से बाहर निकलने का अवसर दिया। फर्रुखाबाद की परिचित गलियों और अपनेपन भरे माहौल को पीछे छोड़कर मैं पढ़ाई के लिए कानपुर आया। यह केवल शहर बदलने की यात्रा नहीं थी, बल्कि बचपन से युवावस्था की ओर बढ़ने का पहला ठोस कदम भी था। नवाबगंज स्थित वीएसएसडी कॉलेज में बीकॉम में दाखिला लिया और उसी के साथ एक बिल्कुल नई दुनिया मेरे सामने खुलने लगी।
कानपुर का माहौल मेरे लिए आकर्षक भी था और थोड़ा डरावना भी। नए चेहरे, नई भाषा, नए तौर-तरीके, सब कुछ अनजान था। नए दोस्तों से मिलना और उनके बीच अपनी जगह बनाना आसान नहीं था। कॉलेज को लेकर पहले से कई किस्से सुन रखे थे। यह भी पता चला था कि यहां को-एजुकेशन होती है, इसलिए मन में एक मासूम-सी उत्सुकता और खुशी भी थी। यह भ्रम जल्द ही टूट गया। बीकॉम की हमारी पूरी कक्षा में एक भी छात्रा नहीं थी।
को-एजुकेशन की सारी कल्पनाएं पहले ही सेमेस्टर में दम तोड़ गईं। फिर भी कॉलेज जीवन निराशाजनक नहीं था। दोस्तों के साथ हंसी-मजाक, कैंटीन की चर्चाएं और कभी-कभार इधर-उधर घूमने की योजनाएं रोजमर्रा का हिस्सा बन गईं। हालांकि पढ़ाई को लेकर माहौल काफी सख्त था। हमारे प्रोफेसर छात्रों की नीयत तुरंत भांप लेते थे। जरा-सी लापरवाही या बहानेबाजी उनके सामने नहीं चलती थी। अनुशासन यहां केवल नियम नहीं, बल्कि आदत बन चुका था।
हमारे विभागाध्यक्ष स्वर्गीय डॉ. ज्ञानचंद अग्रवाल एक विलक्षण व्यक्तित्व थे। उनके व्यवहार में कठोरता नहीं, बल्कि अपनापन था। उनकी सरलता, स्नेह और अनुशासन ने हम सब पर गहरा प्रभाव डाला। वे हमें सिर्फ किताबों का ज्ञान नहीं देते थे, बल्कि जीवन जीने की समझ भी देते थे। आज पीछे मुड़कर देखता हूं, तो महसूस होता है कि कानपुर का वह कॉलेज और वहां बिताया गया समय मेरे व्यक्तित्व की नींव बन गया। जो भी आत्मविश्वास, समझ और अभिव्यक्ति मुझमें आज दिखाई देती है, उसके पीछे मेरे कॉलेज और मेरे गुरुओं का अमिट योगदान है। वे दिन स्मृतियों में आज भी जीवित हैं- एक सीख की तरह, एक संस्कार की तरह।-आरके सफ्फड़, उद्यमी एवं समाजसेवी
