श्री गुरु तेगबहादुर का जीवन संघर्ष
गुरु तेग बहादुर इकलौते गुरु हैं जिन्हें लोक ने अपना गुरु चुना था, पूर्व गुरु हरिकृष्ण के ” बाबा बकाला ” अंतिम शब्द –सूत्र के सहारे। साढ़े पांच महीने से पदासीन गुरु न होने पीड़ित –भ्रमित जन मानस ने स्वंय ढूंढ कर तेग बहादुर में अपना प्रकाश–पाथेय देखा और गुरु पद पर प्रतिष्ठित किया था। उसके पहले सभी गुरु अपना उत्तराधिकारी …
गुरु तेग बहादुर इकलौते गुरु हैं जिन्हें लोक ने अपना गुरु चुना था, पूर्व गुरु हरिकृष्ण के ” बाबा बकाला ” अंतिम शब्द –सूत्र के सहारे। साढ़े पांच महीने से पदासीन गुरु न होने पीड़ित –भ्रमित जन मानस ने स्वंय ढूंढ कर तेग बहादुर में अपना प्रकाश–पाथेय देखा और गुरु पद पर प्रतिष्ठित किया था। उसके पहले सभी गुरु अपना उत्तराधिकारी अभिषिक्त या निर्दिष्ट कर जाते थे। किशोरावस्था से मुगल सेना से युद्ध में तलवार का धनी होने का प्रमाण दे चुके गुरु तेग बहादुर बचपन से त्यागी–वैरागी, सांसारिकता से निर्लिप्त साधक–संत थे। गुरु पद की बडी जिम्मेदारी सौंप दिये जाने पर उन्होंने शौर्य का बाना पहना और गुरु नानक के निर्भयता– निडरता के जीवन –दर्शन को पुर्नस्थापित किया। यह उद्घोष कर – भै काहू को देत नहिं भै मानहिं आन। जन सामान्य की पीडा, दु.ख दूर करना ही उनके जीवन का उद्देश्य रह गया।
गुरु गद्दी खाली थी। औरंगजेब की धर्मांध नीति पूरे उफान पर थी। प्रेरित- प्रोत्साहित कर ही नहीं, तलवार की नोंक पर भी धर्मांतरण कराया जा रहा था। भारत को ‘ दारुल उल इस्लाम’ बनाने के शाही सपने को जल्द से जल्द पूरा करने के लिए उसके अफसरों में होड़ मची थी। निशाने पर मुख्यत: काशी, प्रयाग, कुरूक्षेत्र, हरिद्वार और कश्मीर वगैरह के पंडित-पंडे थे। उन्हें कहा जाता था, इस्लाम अपना लो या मौत को गले लगाओ। बादशाह ने सैकडों पंडितों को जेल में डलवा दिया था, इस आशा से कि यदि इन्होंने पैगंबर के धर्म को अपना लिया तो, बाकी लोग आसानी से उनके रास्ते पर चल पडेंगे। बडे बडे वीर राजपूत राजा – महराजा शाही सल्तनत की सेवा में थे। उसकी पालकी के कहार बने थे। डरे, सहमें इस सोच में कि आगे उनका क्या होगा। किसी में औरंगजेब के खिलाफ आवाज उठाने का साहस नहीं बचा था।
बालगुरू हरि किशन अंतिम समय केवल ‘बाबा बकाला’ कह गए थे। ऐसे में नवें गुरु की खोज शुरू हुई। निष्कर्ष निकाला गया कि आठवें गुरु का संकेत था कि उनका उत्तराधिकारी बकाला गांव में है। अब बकाला में गुरु हर गोबिंद के कई रिश्तेदार थे। बाबा गुरु दित्ता के बेटे धीर मल समेत कम से कम 22 सोढी स्वयंभू गुरु बने बैठे थे। आदि ग्रंथ की मूल प्रति धीर मल के पास थी और औरंगजेब का अनुग्रह भी। स्वाभाविक रूप से वह बडे़ दावेदार थे।
खोज और रस्साकशी जारी थी। माखन शाह लुबाना नाम का एक सम्पन्न सेठ आया। उसने मनौती मानी थी कि उसका माल भरा जहाज डूबने से बच गया तो वह गुरु को सोने की 525 अशर्फियां भेंट करेगा। संयोग से जहाज बच गया था, बकाला में वास्तविक गुरू का पता कर पाना कठिन था। उसने एक एक अशर्फी कथित गुरुओं को बांटना शुरू किया। कहीं कहीं अशर्फियां 500 और देना दो दो कहा है। रात रुका तो किसी ने बताया गुरु हर गोबिंद के सबसे छोटे बेटे तेग बहादुर भी यहां हैं। अगले दिन सेठ ने एक मुद्रा उन्हें भी दी। पर उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब लेने वाले ने कहा कि अपने संकल्प से क्यों फिर रहे हो, बाकी कहां हैं ? सेठ उछल पडा। उसने मकान की छत पर जा चिल्लाकर कहा कि गुरु मिल गए। लोग जुटे और इस तरह नये गुरु की खोज पूरी हुई।
धीरमल के आक्रामक विरोध के बावजूद लोगों ने 43 वर्षीय तेग बहादुर को गुरू माना। यह भी कहा जाता है भतीजे धीरमल ने नये गुरू पर जान लेवा हमला भी किया। गुरू तेग बहादुर समर्थकों ने उसे पकड लिया और कब्जे से ग्रंथ साहिब भी छीन लिया। शांत और संतोषी स्वभाव के गुरू तेग बहादुर ने धीरमल को छोड़वा दिया और ग्रंथ भी वापस करा दिया।
अमृतसर में 1 अप्रैल 1621 को जन्में तेग बहादुर गुरु हर गोबिंद की तीसरी पत्नी के बेटे और भाईयों में सबसे छोटे थे। उनका नाम पहले त्यागमल था। किशोरावस्था में एक युद्ध में तलवार चलाने का कौशल दिखाने पर तेग बहादुर नाम पडा था। भतीजे हरराय को गुरु बनाये जाने के बाद से वह अपनी मां व पत्नी के साथ ननिहाल बकाला में रहते थे।
आगरा, काशी, प्रयाग, हरिद्वार, मथुरा, गया,कीरतपुर, गोबिंदवाल आदि धार्मिक-ऐतिहासिक स्थलों में घूमने पटना में डेरा जमाने के बाद लौटे थे। पटना में उन्हें गुरु हरराय के निधन की सूचना मिली तो उन्होंने कीरतपुर लौटने का निश्चय किया। यह भी कहा जाता है कि पंजाब पहुंचने से पूर्व वह दिल्ली में बीमार बाल गुरु हरकिशन को देखने भी गए।
अगस्त 1664 ई. में सिख संगत ने गुरु तेग बहादुर को गुरू हर किशन के उत्तराधिकारी के रूप में मान्यता दी। इसके ढ़ाई-तीन महीने बाद गुरु तेग बहादुर सपरिवार दर्शन को हरि मंदिर, अमृतसर गए तो प्रबंधकों ने सभी दरवाजे बंद कर दिये। कुछ जगह कहा गया है कि अकाल तख्त ने उनके अमृतसर आने में रोक लगा रखी थी। वह चुपचाप लौट गए और कुछ जमीन खरीदकर मां के नाम चकननकी नगर की स्थापना की जो बाद आनंदपुर साहिब हुआ। कुछ समय बाद वह पूर्व की ओर धर्म प्रचार यात्रा में निकल गए। उनकी सत्संग सभाओं में भीड़ उमड़ती और लोग सिख पंथ से प्रभावित होते। शाही आज्ञा पर पुलिस अधिकारी आलम खां ने साथियों समेत उन्हें गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया।
उन्हें राजा जय सिंह के बेटे कुंवर राम सिंह कक्षवाहा की दो महीने की सुपुर्दगी में दे दिया गया। राजा का परिवार गुरुओं का भक्त था। उसकी पैरवी से से जल्द रिहाई होने पर वह आगरा, इटावा, फतेहपुर, इलाहाबाद, वाराणसी होते हुए पटना पहुंचे। मां व पत्नी को वहां व्यवस्थित रख बंगाल की ओर निकल गए। राजा रामसिंह के आग्रह पर गुरू तेग बहादुर उसके साथ सैन्य अभियान पर असम गए। इसी बीच उन्हें पुत्र रत्न प्राप्त होने की सूचना मिली और वह पटना पत्नी के पास और फिर सबके साथ पंजाब लौटे। पुत्र गोबिंद राय उनके उत्तराधिकारी के रूप में इतिहास के महत्वपूर्ण अध्याय बने।
कनिंघम ने लिखा है कि वह धर्म की आड में शासन-सत्ता के लिए प्रयत्नशील होने और शांतिभंग करने के आरोप में दिल्ली तलब किये। लेकिन जयपुर के राजा ने बादशाह से यह कहकर उनकी पैरवी की कि गुरू तेग बहादुर जैसा संत तीर्थ यात्राओं में जाना पसंद करेगा, राज्य पाने की लालसा नहीं करेगा। वह उन्हें अपने साथ बंगाल के अभियान पर ले जाना चाहते हैं। गुरू तेग बहादुर राजा के साथ पूर्व की ओर गए और कुछ समय पटना रुक फिर असम के बागी राजाओं के खिलाफ चढाई में शामिल और सैन्य अभियान को कामयाब बनाया। उन्होंने ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे कुछ समय ध्यान में बिताया। कामरूप का राजा गुरु तेग बहादुर से प्रभावित होकर उनका अनुयायी बना।
पंजाब लौटने पर उन्होंने अपने पिता के कीरतपुर आश्रम के पास जमीन लेकर अपना ठिकाना बनाया जिसे अब मोखोवाल कहा जाता है। लेकिन राम राय के प्रभाव और उनके प्रति विद्वेष ने उन्हें फिर दिल्ली की नजरों में एक अपराधी के रूप में निरूपित कर दिया। जबकि सिखों के लिए बहुत पवित्र और निर्दोष गुरु ही थे। फिर उन्हें कुछ समय के लिए गिरफ्तारी का सामना करना पडा।
कनिंघम ने लिखा कि सत्य यही लगता है कि वह अपने पिता गुरु हरगोबिंद के नक्शेकदम पर ही चल रहे थे। उन्होंने अपने लिए हांसी और सतलज के बीच का ठिकाना चुना। उनके अनुयायी एक तरह से लूटकर धनार्जन करते जिससे किसानों में उन्हें अलोकप्रिय बनाया। उन्होंने एक मुस्लिम कटृटरपंथी संत आदम हाफिज से गोपनीय संधि की और धनी हिन्दुओं पर चंदा लगाया, जबकि हाफिज ने ऐसा ही धनी मसलमानों के साथ किया। दोनों ने सभी भगोडों को आश्रय दिया और इनकी शक्ति मुल्क की सम्पन्नता में बाधक मानी गयी। शाही सेनायें भेजी गयीं और अंतत: ये पराजित हुए। भगोडों को गिरफ्तार कर लिया गया। आदम हाफिज तो गायब हो गए लेकिन औरंगजेब ने तय किया कि सिख (गुरू तेग बहादुर) को मौत के घाट उतार दिया जाए।
सिख विवरणों में यह कथा नहीं आती। कहा जाता है कि गुरु तेग बहादुर सिख संगठन की मजबूती और विस्तार के लिए लम्बी यात्राओं पर निकलते रहे और मांझी आदि गठन करते रहे। ऐसी एक सुदीर्घ धर्म यात्रा पर वह पूर्व की ओर फिर निकले। पंजाब में औरंगजेब के अत्याचारों की खबर सुन लौटे तो आगरा में 1670 ई. में गिरफ्तार किये गए लेकिन शीघ्र ही रिहा हो गए।
इसके बाद आनंदपुर में बहुश्रुत कश्मीरी पंडितों के आने का प्रकरण हुआ। पंडित कृपाराम के नेतृत्व में कश्मीरी पडितों का एक बडा प्रतिनिधि मंडल आया और कहा कि वहां का गर्वनर शेर अफगन सामूहिक रूप से पंडितों को जबरदस्ती मुसलमान बना रहा है। उसने इस्लाम अपनाने या मौत के लिए अल्टीमेटम दिया है। पं. कृपा राम के दादा ने गुरू हर गोबिंद को कश्मीर यात्रा के दौरान संस्कृत पढायी थी और सिख गुरुओं से उनके अच्छे सम्बन्ध थे।
नौ वर्षीय बेटे गोबिंद राय ने के कहने पर कि बलिदान के लिए आप से उपयुक्त और कौन हो सकता है, गुरु तेग बहादुर ने कश्मीरी पंडितों से गर्वनर के जरिए बादशाह को इस आशय का एक ज्ञापन भेजने को कहा कि अगर गुरू तेग बहादुर इस्लाम में आ जाते हैं तो वे भी उनका अनुसरण कर लेंगे। इस पिटीशन के बाद औरंगजेब ने गुरु तेग बहादुर के खिलाफ गिरफ्तारी का समन जारी किया। समन आने के पहले ही गुरु तेग बहादुर बेटे गोबिंद राय को उत्तराधिकारी घोषित कर दिल्ली की ओर चल दिये और नाभा के पास गिरफ्तार किये गए।
ऐसा लगता है गुरु तेग बहादुर परिस्थितियों को देखते हुए बडी सावधानी से कदम बढा रहे थे। औरंगजेब जैसा कठोर और उस समय दुनिया का सबसे शक्तिशाली सम्राट जिसने अपने तीन भाईयों तक को मार या मरवा दिया था, जिसने अपने पिता शाहजहां को भी कैद में डाल दिया था, ऐसे समय जरा सी चूक पूरे सिख आंदोलन की कमर तोड सकती थी। औरंगजेब इसकी और गुरु तेग बहादुर को हटाने की ताक में रहता ही था। सिखों में अंतरविरोध थे ही और कुछ हिंदू सामंत भी विभिन्न कारणों, खासकर शाही सल्तनत की नजरों का कृपा पात्र बनने के लिए गुरू- सत्ता के खिलाफ सक्रिय रहते थे। सिख आंदोलन को चलाये और बनाये रखने का पूरा दारोमदार अकेले गुरु तेग बहादुर पर था।
उनके व्यक्तित्व का विश्लेषण करें तो गुरु तेग बहादुर हृदय से तो पूरी तरह उच्च कोटि के नानक पंथी संत प्रतीत होते हैं और ऊपर से अपने पिता गुरु हर गोबिंद की सैन्य-तेजस्विता भी धारण करते दिखते हैं। वही मीरी और और फकीरी का युग्म रूप। हालांकि गुरु गद्दी पर सत्तासीन होने पर उन्होंने गुरु हर गोबिंद की तलवार धारण करने से इंकार कर दिया था। पिता के प्रति श्रद्धाभिभूत गुरु तेग बहादुर का कहना था कि वह इसके योग्य नहीं हैं। उनकी निस्पृहता और निरंहकारिता की यह स्थिति की थी कि जब पिता गुरु हर गोबिंद ने 13-14 साल के उनके भतीजे हरराय को अपना उत्तराधिकारी बनाया तो इस निर्णय को सहर्ष स्वीकारते हुए सबसे पहले उन्होंने अपने भतीजे-गुरु को माथा नवाया। गुरु बन जाने के बाद उनके लिए हरि मंदिर के दरवाजे बंद कर दिये गए तब भी बिना कोई नाराजगी जताये वे चुपचाप सपरिवार चले गए। उनके लिए कदम कदम पर कांटे बोने वाले बडे़ भतीजे गुरु दित्ता के प्रति भी उन्होंने वैमनस्य भाव नहीं रखा।
औरंगजेब के खिलाफ सीधे सशसत्र मोर्चा खोलना आत्मघाती होता इसलिए वह अपनी एक सुविचारित रणनीति के तहत अधिक से अधिक जन- जागरण यात्रायें करते और पूर्णत: विपरीत स्थितियों में भी शक्ति जुटाने, सिखों को संगठित करने और हतोत्साहित जन मानस में प्राण फूंकने का कार्य करते रहे। जब उन्हें लगा कि आंदोलन को गति देने का कोई और रास्ता नहीं है तब कश्मीरी पंडितों को बचाने के बहाने अपने आत्मोत्सर्ग का रास्ता स्वंय चुना।
दिल्ली में उनके साथ कितना अपमानजनक और उपहासात्मक व्यवहार किया गया, किस तरह उनके सामने उन्हें झुकाने के लिए उनके साथियों, भाई मतिदास, भाई सतिदास और भाई दयालराम या दयाला को अमानवीय तरीके से मारा गया वह किसी से छिपा नहीं है। आरा से काटना, जिंदा जलाना और तेल के कड़ाह में उबालना। साक्षात क्रूर मृत्यु सामने और इस्लाम अपनाने का दबाव, पर संत हृदय गुरु तेग बहादुर चट्टान की तरह अडिग रहे। आखिर वह गुरु अर्जुन के पौत्र थे। शायद वह जहांगीर के समय उन्हें दी गयी अमानवीय यातनाओं और शहादत को याद कर रहे हों। भारत की धर्म-संस्कृति बचाने को गुरू अर्जुन देव ने अपना बलिदान दिया और वह भी पूरी तरह सोच विचार कर। इसीलिए उन्हें ‘हिंद दा चादर’ अर्थात भारत का कवच, कहा जाता है।
‘शहीदों के सरताज’ गुरु अर्जुन की शहादत के लगभग 69 साल बाद 10 नवम्बर 1675 को हुई गुरु तेग बहादुर की शहादत के कारणों में बडी समानता है। भरे दरबार में जहांगीर की खुली अवज्ञा कर गुरु अर्जुन ने शहादत को चुना था। इसी तरह शाही दरबार में औरंगजेब की खुली अवमानना कर गुरु तेग बहादुर ने। दोनों के सामने मुगल सल्तनत के धार्मिक-राजनीतिक अत्याचारों के खिलाफ प्रतिकार और मरे-बुझे भारतीय जन मानस को झकझोरने का और कोई प्रभावी विकल्प नहीं था। कुछ ऐसा ही आजादी के आंदोलन में शहीद ए आजम सरदार भगत सिंह ने किया।
गुरु अर्जुन के बलिदान ने सिख संस्था के सैन्यीकरण की पृष्ठभूमि तैयार की, उनके पुत्र और उत्तराधिकारी गुरु हर गोबिंद ने शक्तिशाली सेना खड़ी की और सशसत्र संषर्घ किया। गुरु तेग बहादुर की शहादत ने खालसा का आधार तैयार किया। उनके बेटे गुरु गोबिंद सिंह महाराज ने खालसा के जरिए बलिदानियों की बड़ी फौज तैयार कर दी और देश-धर्म के लिए अपना सर्वस्व न्योक्षावर कर दिया। अपना जीवन, अपनी माता, अपनी दोनों पत्नियों और चार छोटे पुत्रों, सबको।
- शंभू दयाल वाजपेयी
