संपादकीय: व्यापार समझौता
भारत–अमेरिका व्यापार समझौते की घोषणा से उत्साह लाजिमी है तो सवाल भी। इस डील को कुछ हलकों में ‘भारत की कूटनीतिक जीत’ और ‘अमेरिका के झुकने’ के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, परंतु अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में हर निर्णय ठोस सामरिक और आर्थिक गणनाओं का परिणाम होता है, न कि भावनात्मक। अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों पर टैरिफ घटाने के पीछे कई कारक हैं।
भारत–यूरोपीय संघ के हालिया समझौते और उससे पहले ब्रिटेन के साथ एफटीए ने यह संकेत दिया कि भारत वैश्विक व्यापारिक मानचित्र पर सक्रिय है। हमारी सक्रिय कूटनीति ने वाशिंगटन को संदेश दिया कि नई दिल्ली बहुध्रुवीय संतुलन साधने में सक्षम है, तो अमेरिका के लिए चीन के विकल्प के रूप में उभरते विनिर्माण केंद्र के संदर्भ में भारत को साथ रखना रणनीतिक आवश्यकता बनी।
18 फीसदी टैरिफ से बाजार में अल्पकालिक उत्साह संभव है, पर दीर्घकालिक लाभ इस पर निर्भर करेगा कि गैर-टैरिफ बाधाएं कितनी कम होती हैं और सप्लाई चेन कितनी स्थिर रहती है। टेक्सटाइल, लेदर और मरीन उत्पाद जैसे श्रमप्रधान क्षेत्रों को कुछ प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिल सकता है, जीडीपी वृद्धि दर में बढ़ोतरी संभावित है पर वह तभी साकार होगा, जब निवेश, निर्यात और विनिर्माण क्षमता समानांतर रूप से बढ़ें। रूस से तेल आयात भारत की ऊर्जा सुरक्षा का प्रश्न है। भारत ने अब तक ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की नीति अपनाई है- न तो पूर्ण निर्भरता, न पूर्ण परहेज़। इसे शून्य पर लाना न आर्थिक रूप से सरल है, न कूटनीतिक रूप से व्यावहारिक।
इसी प्रकार अमेरिकी कृषि निर्यात के लिए भारतीय बाजार खोलना एक संवेदनशील विषय है। भारत का कृषि क्षेत्र आजीविका से जुड़ा प्रश्न है; अतः किसी भी रियायत का घरेलू राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव गंभीर होगा। 500 अरब डॉलर की अमेरिकी खरीद का दावा वर्तमान व्यापार आंकड़ों 2024 में मात्र 212 अरब डॉलर द्विपक्षीय व्यापार के संदर्भ में अतिशयोक्तिपूर्ण प्रतीत होता है। अंतर्राष्ट्रीय वार्ताओं में अक्सर नेतृत्व घरेलू दर्शकों को ध्यान में रखकर बड़े आंकड़े प्रस्तुत करता है। इस समझौते के इर्द-गिर्द सबसे अधिक अस्पष्टता दोनों पक्षों यानी ट्रंप और प्रधानमंत्री मोदी के बयानों में अंतर को लेकर है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि भारत रूस से तेल खरीद बंद करेगा और अमेरिकी उत्पादों पर अपने टैरिफ शून्य करेगा।
वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐसी कोई सार्वजनिक प्रतिबद्धता व्यक्त नहीं की। यह अंतर बताता है कि राजनीतिक बयान और औपचारिक समझौते में भेद होता है। जब तक संयुक्त बयान और विस्तृत मसौदा सार्वजनिक न हो, तब तक इन दावों को अंतिम सत्य मानना जल्दबाजी होगी। हम अपने दीर्घकालिक हितों- रणनीतिक स्वायत्तता, ऊर्जा सुरक्षा और घरेलू उद्योग संरक्षण को सुरक्षित रखना चाहते हैं, जबकि अमेरिका के लिए यह उस रणनीति का हिस्सा है, जिसमें वह चीन के प्रभाव को संतुलित करने के लिए भारत को सशक्त साझेदार बनाना चाहेगा। जब तक विस्तृत समझौता सार्वजनिक न हो, तब तक विवेकपूर्ण प्रतीक्षा ही सर्वोत्तम नीति है। राजनीतिक बयान सुर्खियां बना सकते हैं, पर राष्ट्रहित का मूल्यांकन तथ्यों और दस्तावेजों के आधार पर ही किया जाना चाहिए।
