हाईकोर्ट ने दशकों से लंबित हत्या मामले के 100 वर्षीय आरोपी को किया बरी

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Published By Deepak Mishra
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प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1982 के एक हत्या मामले में लगभग 100 वर्षीय आरोपी को बरी करते हुए कहा कि जब कोई व्यक्ति जीवन के अंतिम चरण में न्यायालय के समक्ष खड़ा हो और मामला दशकों तक लंबित रहा हो, तो केवल दंडात्मक परिणामों पर जोर देना न्याय के उद्देश्य से भटकने जैसा हो सकता है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्याय कोई अमूर्त अवधारणा नहीं है, जिसे मानवीय परिस्थितियों से अलग कर देखा जाए। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति चंद्र धारी सिंह और न्यायमूर्ति संजीव कुमार की खंडपीठ ने हमीरपुर निवासी सत्ती दीन और अन्य की आपराधिक अपील को निस्तारित करते हुए की। कोर्ट ने अभियोजन पक्ष द्वारा आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने में विफलता के साथ-साथ चार दशकों से अधिक समय तक चली आपराधिक प्रक्रिया और आरोपी की अत्यधिक आयु को भी निर्णायक रूप से ध्यान में रखा। 

मामले के अनुसार 9 अगस्त 1982 को मुखबिर अपने भाई गुनुआ के साथ घर लौट रहा था, तभी माइकू (बंदूक), सत्ती दीन (भाला) और धानी राम (कुल्हाड़ी/फरसा) से लैस होकर सामने आए। आरोप था कि पुरानी रंजिश के चलते माइकू ने गुनुआ को गोली मार दी, जिससे उसकी मृत्यु हो गई। वर्ष 1984 में निचली अदालत ने सत्ती दीन और धानी राम को आईपीसी की धारा 302/34 के तहत आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी, जबकि मुख्य आरोपी माइकू कभी गिरफ्तार नहीं हो सका। 

अपील के दौरान सत्ती दीन की मृत्यु हो गई और धानी राम एकमात्र जीवित अपीलकर्ता रह गए। उच्च न्यायालय ने साक्ष्यों के गहन विश्लेषण में अभियोजन की कहानी पर गंभीर संदेह जताया। कोर्ट ने प्रत्यक्षदर्शी गवाहों और चिकित्सीय साक्ष्यों के बीच महत्वपूर्ण विरोधाभास की ओर इशारा किया। जहां गवाहों ने दावा किया कि गोली लगने के बाद मृतक गिर पड़ा और सत्ती दीन ने भाले से उसकी छाती में वार किया, वहीं पोस्टमार्टम रिपोर्ट में ऐसी चोटों का समर्थन नहीं मिला। 

इसी तरह अपीलकर्ता धानी राम के पास कथित कुल्हाड़ी होने के बावजूद, चिकित्सा रिपोर्ट में ऐसे किसी हथियार से लगी चोट का उल्लेख नहीं है। कोर्ट ने एफआईआर की प्रामाणिकता पर भी संदेह व्यक्त किया कि मुखबिर के अनुसार उसके अंगूठे के निशान की स्याही ‘रॉयल ब्लू’ थी, जबकि एफआईआर ‘नीली-काली’ स्याही से लिखी गई थी। 
इससे कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि संभवतः एफआईआर जांच अधिकारी के मौके पर पहुंचने के बाद विचार-विमर्श कर तैयार की गई। इन परिस्थितियों में कोर्ट ने कहा कि घटना की उत्पत्ति और तरीका संदिग्ध है तथा अभियोजन पक्ष ने मामले के मूल तथ्य छिपाए हैं। ऐसे में अपीलकर्ता संदेह के लाभ का अधिकारी है। 

हालांकि बरी करने का आधार साक्ष्यों की कमजोरी रहा, लेकिन कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि धानी राम ने लगभग 40 वर्ष लंबित अपील में जमानत पर बिताए हैं और अब उनकी आयु लगभग 100 वर्ष है। इतनी लंबी देरी महज प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि निष्पक्षता को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण कारक बन जाती है। 

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक आपराधिक प्रक्रिया जो पीढ़ियों तक चलती रहती है, वह केवल जवाबदेही का तंत्र नहीं रह जाती, बल्कि स्वयं में दंड का स्वरूप ग्रहण कर लेती है। परिणामस्वरूप कोर्ट ने दोषसिद्धि को रद्द करते हुए अपील स्वीकार की और अपीलकर्ता धानी राम को सभी आरोपों से बरी कर दिया।

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