संपादकीय :आयोग पर अभियोग
मतदाता सूची किसी भी लोकतंत्र की रीढ़ होती है। यदि उसमें त्रुटि या पक्षपात का संदेह पैदा हो जाए, तो चुनाव की निष्पक्षता पर ही प्रश्न चिह्न लग जाता है। मुद्दा किसी एक राज्य या दल का नहीं, बल्कि मताधिकार की पवित्रता का है। ऐसे में चुनाव आयोग द्वारा चलाए जा रहे मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण अभियान पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री द्वारा उठाए गए सवालों को दलगत राजनीति से इतर गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
सामान्यतः गहन पुनरीक्षण एक जटिल प्रशासनिक कार्य है, जिसमें घर-घर सत्यापन, दस्तावेजों की जांच और आपत्तियों के निस्तारण जैसी प्रक्रियाएं शामिल होती हैं। इसे त्रुटि रहित ढंग से पूरा करने में लंबा समय लगता है। यदि दो वर्ष में होने वाला कार्य तीन महीने में समेटा जा रहा है, तो स्वाभाविक है कि जल्दबाजी से त्रुटियों की आशंका बढ़ेगी। चुनाव आयोग को यह स्पष्ट करना होगा कि किन तकनीकी साधनों या अतिरिक्त संसाधनों के आधार पर वह इतनी तेज गति से यह काम कर रहा है। केवल पश्चिम बंगाल में ही सूक्ष्म पर्यवेक्षकों की नियुक्ति जैसी अतिरिक्त निगरानी की व्यवस्था समानता के सिद्धांत पर प्रश्न उठाता है।
यदि आयोग के पास इसके लिए पूर्व में शिकायतों का इतिहास या उच्च जोखिम वाले क्षेत्र जैसे कारण हैं, तो वह उन्हें सार्वजनिक करे। 58 लाख से अधिक नामों का हटाया जाना अत्यंत गंभीर तथ्य है। यह प्रक्रिया मतदाता सूची को शुद्ध करने के लिए है या बड़े पैमाने पर बहिष्करण का। आयोग का दायित्व केवल ‘डुप्लीकेट हटाना’ नहीं, बल्कि ‘वास्तविक मतदाता को शामिल रखना’ भी है। समावेशन और शुद्धिकरण के बीच संतुलन ही लोकतांत्रिक मर्यादा है। लैंगिक भेदभाव या विशेष समुदायों के नाम अधिक हटने के आरोपों की स्वतंत्र ऑडिट से जांच होनी चाहिए। विवाहित महिलाओं के नाम केवल उपनाम परिवर्तन के कारण हटने के मामलों में स्व-घोषणा और सरल सत्यापन पर्याप्त होना चाहिए।
नामों की गलत वर्तनी या तकनीकी त्रुटियों के कारण नाम हटना भी चिंताजनक है। आयोग को डिजिटल डेटाबेस में सुधार, स्थानीय स्तर पर त्वरित सुधार शिविर और ऑनलाइन शिकायत निस्तारण प्रणाली को सशक्त बनाना होगा। सर्वोच्च न्यायालय ने आधार को एक वैकल्पिक पहचान के रूप में स्वीकार किया है, उसे न मानना आदेश की अवमानना की श्रेणी में आ सकता है। आयोग को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी कर अनुपालन सुनिश्चित करना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ द्वारा नोटिस जारी किया जाना इस पूरे विवाद को संवैधानिक आयाम देता है।
यदि ‘तार्किक विसंगतियों’ की सूची सार्वजनिक नहीं की गई है, तो अदालत निश्चित रूप से स्पष्टीकरण मांग सकती है। चुनाव आयोग की स्वायत्तता लोकतंत्र की आधारशिला है। उस पर ‘सरकारी प्रश्रय’ का आरोप तभी कमजोर होगा जब वह पारदर्शी, समान और तर्कसंगत आचरण प्रदर्शित करे। अंततः सर्वोच्च न्यायालय का कथन स्मरणीय है कि हर समस्या का समाधान संभव है। पर समाधान तभी संभव होगा, जब प्रक्रिया का उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा मतदाताओं को बाहर करना नहीं, बल्कि हर योग्य नागरिक को शामिल करना हो।
