संपादकीय :असहज करते आंकड़े
लोकसभा में पेश देश की छह प्रमुख एयरलाइंस के सरकारी आंकड़े भारतीय नागरिक उड्डयन क्षेत्र को लेकर किंचित असहज करने वाले हैं। पिछले 13 महीनों में 377 विमानों में बार-बार आने वाली तकनीकी खराबियां तथा ऑडिट किए गए लगभग आधे विमानों में दोहराई जाने वाली गड़बड़ियां मिलना चिंता का सबब है। सवाल स्वाभाविक है कि क्या भारतीय विमान यात्रियों की यात्रा असुरक्षित हो चुकी है, इसके पीछे निजी विमानन की होड़ तथा नियामक एजेंसियों की विफलता कितनी जिम्मेदार है?
विमानन उद्योग में छोटी-मोटी तकनीकी खामियां सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा मानी जाती हैं। ‘रिकरिंग डिफेक्ट’ का अर्थ यह नहीं कि हर उड़ान दुर्घटना के कगार पर है। परंतु जब वही गड़बड़ी बार-बार सामने आए, तो यह रख-रखाव, निरीक्षण या प्रणालीगत खामी का संकेत हो सकता है, यही चिंताजनक है। भारत का नागरिक उड्डयन क्षेत्र पिछले एक दशक में तेजी से बढ़ा है। सस्ती हवाई यात्रा और बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने यात्री संख्या में भारी वृद्धि की, पर रखरखाव, अवसंरचना और नियामकीय निगरानी उसी अनुपात में मजबूत नहीं हुई।
डीजीसीए जैसी नियामक संस्था को विमानों की नियमित जांच, ऑडिट और अनुपालन सुनिश्चित करना होगा, क्योंकि एक ही प्रकार की खराबियों का दुहराव केवल एयरलाइंस की समस्या नहीं, बल्कि निगरानी तंत्र की भी परीक्षा है। देखना होगा कि लगातार खराबी के कारण क्या हैं, विमानों का पुराना होना, जिनमें तकनीकी समस्याओं की आशंका अधिक होती है, या फिर प्रतिस्पर्धा की होड़ में लागत घटाने का दबाव अक्सर मरम्मत और स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता को प्रभावित करने के साथ रखरखाव की गुणवत्ता पर असर डाल रहा है।
इसके अलावा मानव संसाधन और प्रशिक्षण, तकनीकी कर्मियों की कमी या उनकी थकान भी इसकी वजह हो सकती है। हम विमान को जमीन पर रख कर राजस्व नुकसान के भय से सामान्य गड़बड़ी के बावजूद सीमित उड़ान की अनुमति दे देते हैं, जबकि अमेरिका और यूरोप में नियामक एजेंसियां काफी कठोर ऑडिट और दंडात्मक प्रावधान लागू करती हैं। उदाहरण के तौर पर, बोइंग 737 मैक्स संकट के बाद अमेरिकी नियामक ने पूरे बेड़े को ग्राउंड कर दिया था। यूरोप में भी गंभीर तकनीकी गड़बड़ी पर तत्काल उड़ान रोकने का प्रावधान है। भारत में भी ऐसी शक्तियां मौजूद हैं, परंतु उनका प्रयोग कितनी दृढ़ता से होता है, यही मूल प्रश्न है, हालांकि यह कहना अतिशयोक्ति होगा कि भारत में हवाई यात्रा व्यापक रूप से असुरक्षित हो चुकी है। परंतु चेतावनी संकेत साफ हैं।
सरकार को डीजीसीए की क्षमता, तकनीकी स्टाफ और ऑडिट प्रक्रियाओं को सुदृढ़ करना होगा। एयरलाइंस को लाभ से पहले सुरक्षा को प्राथमिकता देनी होगी। बेड़े का आधुनिकीकरण, पारदर्शी रख-रखाव रिपोर्टिंग और तकनीकी कर्मियों में निवेश अनिवार्य है। यात्रियों की भी भूमिका है। तकनीकी गड़बड़ी के कारण देरी पर असंतोष स्वाभाविक है, पर सुरक्षा जांच में समय लगना बेहतर है, बनिस्बत जोखिम उठाने के। शिकायत तंत्र का उपयोग, पारदर्शिता की मांग और जागरूकता, ये सब दबाव बनाते हैं कि प्रणाली बेहतर हो।
