काकतीय विरासत की यात्रा : वारंगल और कोटा गुल्लू
हैदराबाद घूमने के बाद हमारा अगला पड़ाव तेलंगाना राज्य का दूसरा सबसे बड़ा शहर वारंगल था। सड़क मार्ग से लगभग 170 किलोमीटर की दूरी हमने रास्ते में एक जगह रुकते हुए चार घंटे में तय कर ली। वारंगल एक ऐतिहासिक शहर होने के साथ मंदिरों और स्मारकों की भूमि है। इसे किंवदंतियों का शहर भी कहा जाता है। 12 वीं से 15 वीं शताब्दी के बीच यह काकतीय राजवंश की राजधानी था।
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वारंगल का गौरवशाली अतीत यहां के स्मारकों में देखा जा सकता है। वारंगल किला, हजार स्तंभों वाला मंदिर, वीरनारायण मंदिर, काकातिया रॉक गार्डन आदि की सैर के बाद हमने घनपुर जाकर कोटा गुल्लू मंदिरों को देखने का निर्णय लिया। यह स्थान वारंगल से करीब 55 किमी दूर स्थित है। स्थानीय भाषा में कोटा गुल्लू का अर्थ ‘किले के अंदर मंदिर’ बताया गया।- राजीव सक्सेना, वरिष्ठ पत्रकार, नोएडा।
उत्कृष्ट वास्तुकला
घनपुर गांव उत्कृष्ट काकतीय वास्तुकला वाले कोटा गुल्लू मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। यहां इन मंदिरों का निर्माण 13वीं शताब्दी के आरंभ में काकतीय वंश के राजा गणपति देव के शासनकाल में हुआ था। प्रसिद्ध रामप्पा मंदिर से 12 किमी दूरी पर स्थित ये मंदिर चालुक्य और काकतीय शैलियों के मिश्रण हैं। 14 वीं और 16 वीं शताब्दी के बीच मुस्लिम सेनाओं के हमलों तथा 17 वीं शताब्दी में इस इलाके में आए बड़े भूकंप में इन मंदिरों को काफी नुकसान पहुंचा था। यहां जटिल नक्काशीदार लाल बलुआ पत्थर के मंदिर, किलेबंद परिसर और खूबसूरती से डिजाइन किए गए स्तंभों वाले हॉल मध्यकालीन तेलंगाना के आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक-राजनीतिक जीवन की झलक प्रस्तुत करते हैं। इसी कारण यह परिसर इतिहास और वास्तुकला प्रेमियों के साथ आध्यात्मिक यात्रियों के लिए दर्शनीय स्थल है।
60 स्तंभों वाला नाट्य मंडपम
कोटा गुल्लू में 22 मंदिर हैं, जो आकार और डिजाइन में अलग-अलग होने के साथ काकतीय लोगों का अद्भुत वास्तुशिल्प प्रदर्शित करते हैं। मुख्य मंदिर, गणपेश्वरलयम , भगवान शिव को समर्पित है और काफी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है। इसके गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग की पूजा की जाती है। गर्भगृह के सामने 60 स्तंभों वाला नाट्य मंडपम है, जिसमें तीन तरफ से प्रवेश द्वार और एक बरामदा है। गर्भगृह के द्वार के चौखटों पर द्वारपालों और उनके सेवकों की मूर्तियां बनी हुई हैं। मंडपम में दो सिर कटे ऋ षियों की मूर्तियां हैं। मंदिर की वास्तुकला में जटिल नक्काशी और टिकाऊ लाल बलुआ पत्थर का इस्तेमाल किया गया है। मुख्य मंदिर के चारों ओर पंक्तियों में व्यवस्थित 19 सहायक मंदिर हैं, साथ ही उत्तर दिशा में एक और शिव मंदिर है। मंडपम के स्तंभ काकतीय वास्तुकला के अनुसार तराशे गए हैं और इनमें छत के बिना बीम लगे हैं। सामने की दीवारों पर देवी-देवताओं, नर्तकियों, संगीतकारों, मदनिकियों, शेरों की सुंदर मूर्तियां बनी हुई हैं।
यात्रा का जीवंत केंद्र
मंदिर के लगभग 200 मीटर आगे चबूतरों पर शिलालेख वाले पत्थर और मूर्तियां स्थापित हैं। इनमें भगवान शिव और विष्णु के खड़ी मुद्रा में विभिन्न रूप दर्शाए गए हैं। यहां सबसे खास सभा मंडप के बरामदे हैं। बरामदे के उत्तरी हिस्से में दो मदनिकाएं दिखाई देती हैं। पूर्वी और दक्षिणी बरामदे गज केसरी की कई पौराणिक आकृतियों से सुशोभित हैं, जो हाथी पर सवार आधे मानव-आधे शेर की आकृति हैं और हाथी पर घोड़े के सिर वाले शेर की पीठ है। कोटा गुल्लू वास्तव में स्थापत्य चमत्कार के साथ पूजा और तीर्थयात्रा का जीवंत केंद्र है। आसपास के जिलों से श्रद्धालु नियमित रूप से मंदिरों में प्रार्थना करने और स्थानीय अनुष्ठानों में भाग लेने आते हैं।
