स्कूल-शिक्षक-समाज : नीति के चौराहे पर खड़ा उत्तराखंड

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Published By Anjali Singh
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उत्तराखंड में विद्यालयों और महाविद्यालयों में न्यून छात्र संख्या के आधार पर पदों के समायोजन, स्थानांतरण और नई भर्तियों पर रोक से जुड़ी हालिया खबर केवल प्रशासनिक निर्णय भर नहीं है, बल्कि यह राज्य की शिक्षा व्यवस्था, शिक्षकों के भविष्य और ग्रामीण समाज की संरचना से जुड़ा गंभीर प्रश्न है। यह विषय जितना वित्तीय अनुशासन से जुड़ा है, उतना ही सामाजिक न्याय, शैक्षिक समानता और संवैधानिक दायित्व से भी।--- जीवन सिंह सैनी

राज्य के पर्वतीय और ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी विद्यालय केवल शिक्षा के केंद्र नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन की धुरी रहे हैं। पलायन, बेरोजगारी, स्वास्थ्य व आधारभूत सुविधाओं के अभाव ने पहले ही इन क्षेत्रों को कमजोर किया है। ऐसे में छात्र संख्या में प्रतिवर्ष 7 से 12 प्रतिशत की गिरावट एक स्वाभाविक सामाजिक परिणाम है, न कि शिक्षकों या विद्यालयों की विफलता। यदि इसी गिरावट को आधार बनाकर स्कूलों को ‘अप्रासंगिक’ ठहराया जाएगा, तो यह समस्या के समाधान के बजाय उसे और गहरा करेगा।

नई शिक्षा नीति 2020 के अंतर्गत क्लस्टर योजना का उद्देश्य संसाधनों का साझा उपयोग और शैक्षिक गुणवत्ता में सुधार है। किंतु जब इस योजना को केवल न्यून छात्र संख्या से जोड़कर देखा जाता है और उसका परिणाम शिक्षकों को ‘सरप्लस’ घोषित कर स्थानांतरण के रूप में निकलता है, तो नीति की आत्मा ही आहत होती है। शिक्षा नीति का लक्ष्य शिक्षक को असुरक्षित करना नहीं, बल्कि उसे सशक्त बनाना होना चाहिए।

वित्त विभाग का यह तर्क कि संसाधनों का बेहतर प्रबंधन आवश्यक है, अपनी जगह उचित है, लेकिन क्या बेहतर प्रबंधन का अर्थ पदों को कम करना या रिक्त छोड़ देना ही है? क्या यह नहीं देखा जाना चाहिए कि राज्य के कई दुर्गम क्षेत्रों में आज भी विषय विशेषज्ञों और योग्य शिक्षकों की भारी कमी है? यदि कुछ विद्यालयों में छात्र संख्या कम है, तो समाधान विद्यालय बंद करना या पद घटाना नहीं, बल्कि स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप नवाचार, बहुस्तरीय शिक्षण, डिजिटल सहायता और सामुदायिक भागीदारी बढ़ाना होना चाहिए।

शिक्षकों को बार-बार दुर्गम से सुगम और सुगम से दुर्गम स्थानों पर स्थानांतरित करने की नीति ने पहले भी शिक्षा की निरंतरता को नुकसान पहुंचाया है। शिक्षक असुरक्षा के वातावरण में न तो शैक्षणिक नवाचार कर पाता है और न ही समाज के साथ स्थायी रिश्ता बना पाता है। यदि सरप्लस के नाम पर स्थानांतरण का नया फॉर्मूला लागू हुआ, तो इसका सीधा असर शिक्षकों के मनोबल, पारिवारिक जीवन और शैक्षणिक गुणवत्ता पर पड़ेगा। यह भी विचारणीय है कि पद समाप्त होने या रिक्त रहने से अल्पकालिक वित्तीय बचत तो हो सकती है, लेकिन दीर्घकाल में इसका मूल्य समाज को चुकाना पड़ेगा।

जब स्कूल कमजोर होंगे, तो निजी और महंगी शिक्षा का दबाव बढ़ेगा, जिससे सामाजिक असमानता और गहरी होगी। ग्रामीण बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार केवल कागजी रह जाएगा। राजकीय शिक्षक संघ द्वारा समय रहते इस विषय को उठाना दूरदर्शिता का परिचायक है। यदि 2023 में पदोन्नति मुद्दा था, तो 2026 में आर्थिक हानियों से बचाव और 2028-2030 में स्कूल व नौकरी बचाने की चेतावनी एक गंभीर संकेत है। यह केवल शिक्षकों की लड़ाई नहीं, बल्कि सरकारी शिक्षा प्रणाली को बचाने की लड़ाई है। अब आवश्यकता है कि शिक्षक संगठन भावनात्मक नहीं, बल्कि अकादमिक और नीतिगत स्तर पर ठोस प्रस्ताव लेकर आगे आए।

जैसे-

* न्यून छात्र संख्या वाले विद्यालयों में बहु-विषयक और बहु-ग्रेड शिक्षण मॉडल लागू करना।

* क्लस्टर योजना में शिक्षक सुरक्षा को अनिवार्य शर्त बनाना।

* ग्रामीण क्षेत्रों में विशेष शैक्षिक प्रोत्साहन योजनाएं शुरू करना।

* पदों को समाप्त करने के बजाय पुनर्नियोजन और प्रशिक्षण के माध्यम से उपयोगी बनाना।

सरकार और शिक्षक संघ दोनों को यह समझना होगा कि शिक्षा खर्च नहीं, निवेश है। यदि आज विद्यालय और शिक्षक सुरक्षित नहीं किए गए, तो आने वाले वर्षों में समाज, राज्य और लोकतंत्र तीनों इसकी कीमत चुकाएंगे। कलम की शक्ति तभी बुलंद होगी, जब नीति में संवेदनशीलता और निर्णय में दूरदृष्टि होगी।

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