शिक्षा बजट 2026: शिक्षा, कौशल विकास और रोजगार के साझा मॉडल की परिकल्पना

Amrit Vichar Network
Published By Anjali Singh
On

केंद्रीय बजट 2026-27 में शिक्षा को लेकर सरकार ने यह संकेत देने की कोशिश की है कि भविष्य की अर्थव्यवस्था की नींव कक्षा, कौशल और तकनीक के मेल से रखी जाएगी। वित्त मंत्री द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार शिक्षा पर कुल आवंटन बढ़ाकर लगभग 1.39 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया है, जो पिछले वित्तीय वर्ष के 1.28 लाख करोड़ रुपये की तुलना में करीब 8.6 प्रतिशत की वृद्धि को दर्शाता है। पहली नजर में यह बढ़ोतरी उल्लेखनीय लगती है और सरकार इसे भविष्य की तैयारी के रूप में प्रस्तुत कर रही है, लेकिन गहराई से देखने पर यह सवाल भी सामने आता है कि क्या यह बजट वास्तव में पुरानी संरचनात्मक समस्याओं से किनारा करता है या उन्हें नई शब्दावली में ढक देता है।-कुमार सिद्धार्थ

तकनीकी कौशल से करियर की राह

इस बजट का केंद्रीय विचार शिक्षा, कौशल विकास और रोजगार को एक साझा रणनीति के रूप में जोड़ने का है। सरकार का मानना है कि केवल डिग्री आधारित शिक्षा अब पर्याप्त नहीं है, इसलिए पाठ्यक्रमों को उद्योग, तकनीक और वैश्विक जरूरतों से जोड़ना आवश्यक है। इसी सोच के तहत स्कूलों और कॉलेजों में कौशल आधारित ढांचे को मजबूत करने की घोषणाएं की गई हैं। सबसे अधिक चर्चा में रहने वाला प्रस्ताव 15 हजार स्कूलों और 500 कॉलेजों में ‘एवीजीसी कंटेंट क्रिएटर लैब’ स्थापित करने का है। एनीमेशन, विजुअल इफेक्ट्स, गेमिंग और कॉमिक्स जैसे क्षेत्रों को भविष्य के रोजगार से जोड़ते हुए सरकार ने यह स्पष्ट किया है कि डिजिटल और क्रिएटिव इकोनॉमी अब औपचारिक शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा बनेगी। बजट दस्तावेजों में यह भी उल्लेख है कि वर्ष 2030 तक एवीजीसी और इससे जुड़े डिजिटल क्रिएटिव सेक्टर में लगभग 20 लाख लोगों को रोजगार की आवश्यकता होगी। ऐसे में स्कूल स्तर से ही कंटेंट क्रिएशन, डिजिटल स्टोरीटेलिंग और तकनीकी कौशल सिखाने की योजना को सरकार एक दूरदर्शी कदम के रूप में पेश कर रही है। इससे युवाओं को केवल नौकरी खोजने वाला नहीं, बल्कि रोजगार सृजन में सक्षम बनाने का दावा किया गया है।

शिक्षा नीति को लचीला बनाने का लक्ष्य

उच्च शिक्षा के मोर्चे पर बजट का झुकाव तकनीक, अनुसंधान और उद्योग से सीधे जुड़ाव की ओर दिखाई देता है। औद्योगिक और लॉजिस्टिक कॉरिडोर के पास पांच यूनिवर्सिटी टाउनशिप विकसित करने का प्रस्ताव इसी दिशा में उठाया गया कदम है। सरकार का तर्क है कि जब विश्वविद्यालय, रिसर्च सेंटर, स्किल हब और उद्योग एक ही भौगोलिक क्षेत्र में होंगे, तो छात्रों को पढ़ाई के साथ-साथ व्यावहारिक अनुभव, इंटर्नशिप और रोजगार के बेहतर अवसर मिलेंगे। यह मॉडल शिक्षा और उद्योग के बीच लंबे समय से चली आ रही दूरी को पाटने का प्रयास है। बजट में यह भी कहा गया है कि शिक्षा को रोजगार और उद्यमिता से जोड़ने के लिए एक उच्च-स्तरीय स्थायी समिति गठित की जाएगी। यह समिति आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा साइंस और उभरती तकनीकों के संदर्भ में यह आकलन करेगी कि भविष्य में कौशल और रोजगार की ज़रूरतें कैसे बदलेंगी और उसी अनुसार पाठ्यक्रमों में सुधार की सिफारिश करेगी। यह पहल संकेत देती है कि सरकार शिक्षा नीति को स्थिर नहीं, बल्कि बदलती अर्थव्यवस्था के अनुरूप लचीला बनाना चाहती है।

डिजिटल अवसंरचना पर जोर

स्कूल शिक्षा के संदर्भ में बजट में डिजिटल और तकनीकी अवसंरचना पर जोर दिखाई देता है। डिजिटल कंटेंट, ऑनलाइन संसाधन और नई तकनीकों के माध्यम से शिक्षा को सुलभ बनाने की बात कही गई है, लेकिन सवाल यह भी है कि क्या शिक्षक प्रशिक्षण, स्कूलों की भौतिक सुविधाएं और ग्रामीण-आदिवासी क्षेत्रों की जमीनी हकीकत इस डिजिटल छलांग के साथ तालमेल बिठा पाएगी। कई विश्लेषणों में यह चिंता भी जताई गई है कि यदि शिक्षक ही प्रशिक्षित नहीं होंगे, तो स्मार्ट बोर्ड, डिजिटल लैब और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म धूल ही फांकेंगे। राज्य विश्वविद्यालयों और संबद्ध कॉलेजों की स्थिति पर बजट अपेक्षाकृत मौन दिखाई देता है। जबकि देश के लगभग 80 प्रतिशत विद्यार्थी इन्हीं संस्थानों में पढ़ते हैं, अनुसंधान और बुनियादी सुविधाओं के लिए मिलने वाला अधिकांश फंड अब भी केंद्रीय और प्रीमियम संस्थानों तक सीमित रहता है।

इस असंतुलन के कारण राज्य विश्वविद्यालयों में शोध संस्कृति कमजोर होती जा रही है और बजट में इस खाई को पाटने के लिए कोई ठोस रोडमैप साफ नजर नहीं आता। बजट में यह भी उल्लेख है कि शिक्षा, कौशल और रोजगार को जोड़कर “भविष्य की अर्थव्यवस्था” की नींव रखी जा रही है। युवाओं को नेतृत्व के लिए तैयार करने की बात कही गई है और इसे जनसांख्यिकीय लाभांश से जोड़ा गया है। भारत की लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम उम्र की है और सरकार इस युवा शक्ति को उत्पादक मानव संसाधन में बदलने का लक्ष्य रखती है, लेकिन यह लक्ष्य तभी साकार होगा, जब शिक्षा केवल तकनीकी दक्षता तक सीमित न रहे, बल्कि आलोचनात्मक सोच, सामाजिक संवेदनशीलता और रचनात्मकता को भी स्थान दे।

कुल मिलाकर, बजट 2026-27 का शिक्षा खंड एक दोहरे संदेश के साथ सामने आता है। एक ओर यह तकनीक, कौशल और रोजगार के ज़रिए भविष्य की तैयारी की बात करता है, दूसरी ओर यह पुरानी समस्याओं जैसे अपर्याप्त सार्वजनिक निवेश, शिक्षक भर्ती की कमी और राज्य स्तरीय संस्थानों की उपेक्षा से पूरी तरह मुक्त होता नहीं दिखता। यह बजट शिक्षा को आर्थिक विकास के औजार के रूप में तो देखता है, लेकिन उसे सामाजिक समानता और बौद्धिक स्वतंत्रता के व्यापक संदर्भ में रखने का साहस अभी अधूरा लगता है। आखिरकार, यह कहना गलत नहीं होगा कि शिक्षा बजट 2026-27 दिशा तो दिखाता है, लेकिन दूरी अभी तय होनी बाकी है। यह भविष्य की तैयारी का दावा करता है, पर साथ ही यह सवाल भी छोड़ जाता है कि क्या हम पुरानी समस्याओं को हल किए बिना सचमुच एक समावेशी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व्यवस्था की ओर बढ़ पाएंगे?

संबंधित समाचार