बर्बरीक: करुणा, त्याग और धर्म-संतुलन का अमर प्रतीक

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Published By Anjali Singh
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यदि हम अपने पौराणिक इतिहास का दृष्यावलोकन करें, तो सबसे बड़े दानी के रूप में हमारे सामने कर्ण का नाम आता है- कर्ण से जिसने जो मांगा, उसने वह उसको दान में दिया, परंतु यहां हम देखते हैं कि कर्ण ने सदैव अर्थ का ही दान किया, परंतु वो योद्धा जो सर्वशक्तिमान था, धर्म का ज्ञाता था, जिसने अपने शीश तक का दान दे दिया, ऐसा अभूतपूर्व परमवीर योद्धा- एक मात्र और केवल एक बर्बरीक हुए हैं। बर्बरीक भी कर्ण के काल में ही पैदा हुए और कर्ण के साथ ही महाभारत युद्ध में अप्रकट भी हो गए।-अशोक सूरी

स्कंद पुराण में उल्लेख 

बर्बरीक कुंती पुत्र महाबली भीम के पौत्र और अति बलशाली मायावी घटोत्कच के पुत्र थे। इनकी मां का नाम नागकन्या अहिलावती (कहीं-कहीं मोरवी) था। भारतीय पौराणिक परंपरा में कुछ पात्र ऐसे हैं, जो ग्रंथों में तो बहुत सीमित रूप से दिखाई देते हैं, परंतु लोक गाथाओं में विशाल स्वरूप धारण कर लेते हैं। बर्बरीक ऐसा ही एक नाम है, जो महाभारत के युद्ध में बिना कोई अस्त्र उठाए इतिहास में अमर हो गए। आगे चलकर यही वीर बर्बरीक खाटू श्याम के रूप में लोक आस्था का केन्द्र बने और घर-घर पूजे जाने लगे। बर्बरीक की कथा मुख्य रूप से स्कंद पुराण के कौमारिका एवं रेवा खंड में मिलती है, परंतु यहां भी बर्बरीक नाम का उल्लेख नहीं मिलता है। वर्तमान में उपलब्ध स्कंद पुराण के अवंती खंड/ रेवा खंड में श्याम/श्यामदेव की कथा का संकेत है, जिसको कलियुग में पूजे जाने का वरदान भगवान श्री कृष्ण ने दिया है और शीशदान की स्वीकृति प्रदान की है। 
प्रचलित स्कंद पुराण में निम्न श्लोक का उल्लेख है।

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शीशं मे देवदेवेश गृहाण पुरुषोत्तम। युद्ध दर्शनमिच्छामि तव प्रसादान्महामुने।। अर्थात हे पुरुषोत्तम मेरा यह शीश स्वीकार कीजिए एवं मैं आपकी कृपा से इस महायुद्ध का साक्षी बनना चाहता हूं। इसके अलावा एक और श्लोक आता है कि कलौ त्वं श्यामनामा पूज्यः सर्वजन प्रियः। भविष्यसि महामात्र भक्तानां फलदायकः।। अर्थात कलयुग में तुम श्याम नाम से पूजे जाओगे और तुम सबके प्रिय और भक्तों को वांछित फल प्रदान करने वाले होगे। पूर्व में आप श्याम के नाम से ही जाने जाते रहे और इसी नाम से आपका पूजन भी होता रहा। 

महाभारत का मौन साक्षी

पौराणिक कथाओं के अनुसार बर्बरीक एक अद्भुत वीर थे, जिन्होंने देवी की घनघोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने भगवान शिव से बर्बरीक को वरदान देने की प्रार्थना की। भगवान शिव ने बर्बरीक को तीन अचूक बाण प्रदान किए। ये सामान्य बाण नहीं, बल्कि दिव्य और चेतन अस्त्र थे, जो युद्धभूमि में स्वयं ही शत्रु और मित्र का भेद कर सकते थे। इन्हीं बाणों के कारण बर्बरीक अपार शक्ति के स्वामी बने और एक श्रेष्ठ वीर के रूप में विख्यात हुए। बर्बरीक की विशेषता केवल उनकी शक्ति नहीं थी, बल्कि उस शक्ति पर उनका विवेकपूर्ण नियंत्रण भी था। जब उनकी माताश्री को अपने पुत्र की अद्भुत सामर्थ्य का ज्ञान हुआ, तो उन्होंने उससे एक ही प्रतिज्ञा करवाई—कि वह इन बाणों का उपयोग केवल असहाय और कमजोर समाज की रक्षा के लिए करेगा। उन्होंने पुत्र से यह भी कहा कि उसे सदैव युद्ध में हारने वाले पक्ष का साथ देना होगा। बर्बरीक ने मां की इस आज्ञा और प्रतिज्ञा का जीवनपर्यंत पालन किया। इसी कारण वे “हारे का सहारा” कहे गए।

घटोत्कच की मृत्यु के बाद बर्बरीक ने युद्ध में जाने की अनुमति मांगी। मां ने उन्हें विदा करते समय फिर से उनकी प्रतिज्ञा स्मरण कराई। महाभारत के युद्ध में उस समय कौरवों की स्थिति कमजोर थी और वे पराजय के निकट थे। अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार बर्बरीक ने कौरवों के पक्ष में युद्ध करने का निर्णय लिया। परंतु यह स्थिति धर्म के संतुलन के लिए घातक थी। भगवान श्रीकृष्ण, जो पांडवों के पक्ष में थे, बर्बरीक की शक्ति और उनकी प्रतिज्ञा को भली-भांति समझ गए। उन्होंने बर्बरीक से युद्ध में आने का कारण पूछा। बर्बरीक ने स्पष्ट किया कि वह सदैव हारने वाले का साथ देता है। यह भाव करुणा से उपजा था, किंतु धर्म की दृष्टि से विनाशकारी हो सकता था।

श्रीकृष्ण ने बर्बरीक की शक्ति की परीक्षा ली, जिसमें वे पूर्णतः सफल हुए। तब भगवान को एक कठोर और अप्रिय निर्णय लेना पड़ा। ब्राह्मण के वेश में उन्होंने बर्बरीक से शीश का दान मांगा। महादानी बर्बरीक ने दान स्वीकार किया, परंतु पहले भगवान का वास्तविक स्वरूप देखने की इच्छा प्रकट की। श्रीकृष्ण के दर्शन के बाद बर्बरीक ने कहा कि अब जीवन का कोई प्रयोजन नहीं बचा। उन्होंने केवल एक इच्छा रखी—युद्ध को अंत तक देखने की। भगवान के “एवमस्तु” कहते ही बर्बरीक ने अपना शीश अर्पित कर दिया। श्रीकृष्ण ने उस शीश को एक ऊँचे टीले पर स्थापित किया, जहाँ से वह संपूर्ण युद्ध देख सका। इस महान त्याग के फलस्वरूप भगवान ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि कलियुग में वे उनके ही नाम “श्याम” से पूजे जाएंगे। यही श्याम आगे चलकर खाटू श्याम के रूप में विख्यात हुए।

राजस्थान के सीकर में प्रमुख धाम

राजस्थान के सीकर जिले में स्थित खाटू उनका प्रमुख धाम है- जहां श्याम केवल एक पौराणिक स्मृति नहीं, बल्कि लोक आस्था के जीवंत देवता हैं। लोक कथाओं में प्रचलित है कि बर्बरीक के शीश का खाटू में प्राकट्य हुआ था। खाटू श्याम की विषेशता यह है कि यहां श्याम राजा नहीं, सेवक के रूप में पूजे जाते हैं, जबकि द्वारका में द्वारिकाधीश के रूप में पूजे जाते हैं। खाटू श्याम युद्ध जिताने वाले देव नहीं हैं, अपितु संकट में साथ देने वाले आराध्य हैं। लोक कथाओं के अनुसार खाटू के राजा रूपसिंह की पत्नी नर्मदा कंवर को स्वप्न में भगवान के शीश के प्रकट होने का आभास हुआ था, जिसके बाद राजा रूपसिंह चौहान ने सन् 1027 ई. में इस स्थान पर प्रथम मंदिर का निर्माण करवाया। इसके उपरांत सन् 1727 में मारवाड़ के दीवान अभय सिंह ने मंदिर का भव्य जीणोद्धार करवाया।

मंदिर के निर्माण में मकराना के प्रसिद्ध सफेद संगमरमर का उपयोग हुआ है तथा गर्भगृह के दरवाजों की परतों को चांदी से मढ़ा गया है। मंदिर के पास ही श्याम कुंड स्थित है, जहां बाबा का पावन शीश प्रकट हुआ था। श्याम बाबा का पूजन गंध, पुष्प, धूप, दीप एवं भोग से किया जाता है। बाबा को भोग में विशेष रूप से चूरमा मिश्री मावा, खीर या पेड़े का भोग लगाया जाता है। बाबा को मुख्य रूप से ध्वजा को विजय प्रतीक के रूप में अर्पित करते हैं। भक्तों को मोरछड़ी से आशीर्वाद प्राप्त होता है। 21 फरवरी से 28 फरवरी तक खाटूश्याम जी मंदिर में श्रद्धा, भक्ति और उल्लास से परिपूर्ण फाल्गुन लक्खी मेले का आयोजन किया जाएगा।