जॉब का पहला दिन: जब सपना बना सकारात्मक परिवर्तन का संकल्प
मेरा बचपन से ही शिक्षक बनने का सपना था। विद्यालय के दिनों में जब मैं अपने गुरुओं को श्रद्धा और सम्मान के साथ देखता, तो मन में यही आकांक्षा जन्म लेती कि एक दिन मैं भी ज्ञान का दीप प्रज्वलित करूंगा। वह स्वप्न 4 जुलाई 1994 को साकार हुआ, जब मैंने अपने शिक्षकीय जीवन की पहली पारी शुरू की। वह दिन आज भी स्मृतियों में उसी ताजगी के साथ अंकित है।
पहले दिन मैं ऊर्जा, उत्साह और हल्की-सी घबराहट के मिश्रित भावों से भरा विद्यालय पहुंचा। परिसर में प्रवेश करते ही बच्चों की चहचहाहट और प्रार्थना की धुन ने मन को अद्भुत सुकून दिया। प्रार्थना सभा में जब मेरा परिचय समस्त विद्यार्थियों और शिक्षकों से कराया गया, तो हृदय गर्व से भर उठा। उसी क्षण मुझे कक्षा अध्यापक का दायित्व भी सौंपा गया। यह विश्वास मेरे लिए सम्मान के साथ-साथ उत्तरदायित्व का संकेत था।
सभा के उपरांत शिक्षा अधिकारी श्री जीपी वंतू ने मुझे अपने कक्ष में बुलाया। उन्होंने मुस्कुराते हुए मेरी शक्तियों और कमजोरियों के बारे में पूछा। मैंने निस्संकोच कहा कि अनुशासन और नैतिक मूल्यों के प्रति मेरी दृढ़ आस्था मेरी सबसे बड़ी शक्ति है। साथ ही स्वीकार किया कि कभी-कभी शीघ्र क्रोध आ जाना मेरी कमजोरी रही है, पर मैं स्वयं को निरंतर सुधारने का प्रयास करता रहूंगा। मेरी स्पष्टवादिता से वे संतुष्ट दिखे और मुझे शुभकामनाएं दीं। पहली बार जब मैं अपनी कक्षा में पहुंचा, तो उत्सुक निगाहें मुझे देख रही थीं। मैंने औपचारिकता छोड़कर संवाद का रास्ता चुना।
बच्चों से उनके सपनों, रुचियों और खेलकूद के बारे में बात की। खेल मेरा प्रिय क्षेत्र रहा है और इसी माध्यम से विद्यार्थियों से आत्मीय संबंध स्थापित करने की शुरुआत हुई। मुझे लगा कि शिक्षक का दायित्व केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास, चरित्र निर्माण और जीवन मूल्यों के संवर्धन से भी गहराई से जुड़ा है। उस दिन घर लौटते समय मन में संतोष और संकल्प दोनों थे।
संतोष इस बात का कि मेरा स्वप्न साकार हुआ और संकल्प इस बात का कि मैं अपने विद्यार्थियों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन का कारण बनूंगा। रात को देर तक मैं उसी दिन की घटनाओं को याद करता रहा और भविष्य की योजनाएं बनाता रहा। सचमुच, वह पहला दिन मेरे जीवन की दिशा तय करने वाला अविस्मरणीय अध्याय बन गया।- कृष्ण कुमार मिश्र प्रधानाचार्य, अयोध्या
