भारतीय सिनेमा के ‘ऑर्सन वेल्स’ गुरु दत्त 

Amrit Vichar Network
Published By Anjali Singh
On

सिनेमा निर्माण के विभिन्न कलात्मक पक्षों में अपने प्रयोगधर्मी प्रयासों के लिए ‘भारत के ऑर्सन वेल्स’ कहे जाने वाले महान फिल्मकार गुरु दत्त का यह जन्मशती वर्ष है। यह केवल एक कैलेंडर का आंकड़ा नहीं है, बल्कि उस कालजयी सृजन का उत्सव है, जिसने भारतीय सिनेमा को विश्व पटल पर एक नई पहचान दी। आज पूरी दुनिया एक फिल्मकार के रूप में उनके योगदान के विभिन्न पक्षों की विवेचना कर रही है। उनकी दूरदृष्टि से अचंभित होकर लोग उन्हें अपने समय से बहुत आगे का रचनाकार मान रहे हैं।-अभिषेक मिश्र

स्मृति के विविध रंग

इस वर्ष उनकी स्मृति में उनके प्रशंसकों द्वारा वैश्विक स्तर पर विविध कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। उनकी फिल्मों का पुनर्प्रदर्शन, उनकी कृतियों पर आधारित फिल्म फेस्टिवल और कला दीर्घाओं में उनके कार्यों पर परिचर्चाएं यह सब उनके प्रति आज भी कायम दीवानगी का प्रमाण है। विशेष रूप से ‘सारेगामा कारवां’ के नए संस्करण में गुरु दत्त की फिल्मों के गानों पर एक पृथक खंड का शामिल किया जाना यह बताता है कि उनका संगीतबोध आज भी उतना ही प्रासंगिक है। दास्तानगोई जैसी पारंपरिक विधाओं के माध्यम से उनकी जीवन यात्रा को नए श्रोताओं तक पहुंचाया जा रहा है। शायद गुरु दत्त की आत्मा आज उस संतुष्टि का अनुभव कर पा रही हो, जो उन्हें जीते जी न मिल सकी।

प्रारंभिक जीवन : गुरु दत्त का जन्म 3 जुलाई 1925 को बेंगलुरु में एक मध्यमवर्गीय चितरपुर सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके बचपन का नाम वसंत कुमार शिवशंकर पादुकोणे था। उनके व्यक्तित्व के निर्माण में उनके माता-पिता की शैक्षणिक और साहित्यिक पृष्ठभूमि का गहरा प्रभाव था। उनके पिता श्री शिवशंकर राव पादुकोणे एक साहित्य प्रेमी प्रधानाध्यापक थे, जो अंग्रेजी में कविताएं लिखते थे। उनकी मां वसंती पादुकोणे भी लघुकथाएं लिखती थीं और बांग्ला उपन्यासों का कन्नड़ में अनुवाद करती थीं। परिवार की आर्थिक स्थिति और पिता के अंतर्मुखी स्वभाव ने गुरु दत्त को भी एकांतप्रिय बना दिया। जब उनका परिवार कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) स्थानांतरित हुआ, तो वहां के सांस्कृतिक परिवेश ने उनके भीतर के कलाकार को अंकुरित होने का अवसर दिया। यहीं से वसंत कुमार ‘गुरु दत्त’ बनने की दिशा में अग्रसर हुए।

कला का प्रवेश: गुरु दत्त की फ़िल्मों की सिनेमैटोग्राफी में प्रकाश और छाया (Chiaroscuro) का जो जादुई मेल दिखता है, उसके बीज उनके बचपन में ही पड़ गए थे। उनकी दादी शाम की आरती के लिए जो दिया जलाती थीं, उसकी रोशनी में वे अपनी उंगलियों से दीवार पर छाया आकृतियां बनाया करते थे। दीये का यह खेल उनके जीवन का रूपक बन गया, जैसे एक दिया खुद को जलाकर रोशनी फैलाता है, गुरु दत्त ने भी अपने भीतर के संघर्ष की आग से सिनेमा को रोशन किया। नृत्य के प्रति उनके लगाव ने उन्हें सुप्रसिद्ध नर्तक उदयशंकर के अल्मोड़ा स्थित ‘इंडियन कल्चरल सेंटर’ तक पहुंचाया। पांच साल की नृत्य शिक्षा ने उन्हें दृश्य की लय और फ्रेमिंग की अद्भुत समझ दी। यहीं से उनका सफर प्रभात स्टूडियो पहुंचा, जहां उनकी मुलाकात दो अनमोल मित्रों रहमान और देव आनंद से हुई।

निर्देशन और अभिनय का द्वंद्व

गुरु दत्त मूलतः एक निर्देशक थे, जो कैमरे के पीछे से दुनिया देखना पसंद करते थे। वे एक ऐसे फिल्मकार थे जिनके दिमाग में पूरा दृश्य पहले से ही तैयार रहता था, लेकिन वे उसे शब्दों में व्यक्त करने में अक्सर असहज रहते थे। उनकी यह खामोशी अक्सर सेट पर उनके साथियों के लिए पहेली बन जाती थी। यह दिलचस्प है कि अपनी उत्कृष्ट फिल्म ‘प्यासा’ के लिए वे पहले दिलीप कुमार के पास गए थे, लेकिन जब बात नहीं बनी, तो उन्होंने स्वयं ‘विजय’ का किरदार निभाया और अभिनय की ऐसी मिसाल पेश की जिसे आज भी मील का पत्थर माना जाता है। कैमरे के प्रति उनकी शुरुआती हिचकिचाहट उनकी फिल्मों ‘बाजी’ और ‘जाल’ में छोटी उपस्थिति के रूप में देखी जा सकती है, लेकिन अंततः अपनी कहानियों को जीवंत करने की चाह उन्हें पर्दे के सामने ले ही आई।

सिनेमा : गुरु दत्त की फिल्में उनके निजी जीवन और सामाजिक सरोकारों का प्रतिबिंब थीं। ‘प्यासा’ के माध्यम से उन्होंने एक ऐसे कलाकार की व्यथा दिखाई, जिसे समाज उसकी मृत्यु के बाद पूजता है। वहीं ‘कागज के फूल’ भारतीय सिनेमा की पहली ‘सिनेमास्कोप’ फिल्म थी, जो एक निर्देशक के पतन और अकेलेपन की मार्मिक गाथा थी। यह फिल्म उनके लिए इतनी व्यक्तिगत थी कि जब यह बॉक्स ऑफिस पर असफल हुई, तो उन्होंने इसे अपनी व्यक्तिगत हार मान लिया।

उनकी अंतिम निर्देशित फिल्म की असफलता ने उनके आत्मविश्वास को इस कदर झकझोरा कि उन्होंने फिर कभी किसी फिल्म को आधिकारिक रूप से निर्देशित नहीं किया। ‘साहब, बीवी और गुलाम’ और ‘चौदहवीं का चांद’ में वे पर्दे पर तो दिखे, लेकिन निर्देशन की कमान दूसरों के हाथों में रही।

मानसिक स्वास्थ्य: गुरु दत्त का जीवन केवल कला की गाथा नहीं है, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य और अवसाद के साथ एक लंबी जद्दोजहद की कहानी भी है। आज जब हम मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात करते हैं, तब गुरु दत्त का अस्तित्व इस विषय पर चर्चा के एक प्रतीक के रूप में उभरता है। वे अक्सर अपने मित्रों से कहते थे, ‘पैसा है, शोहरत है, सब कुछ है, पर कुछ भी नहीं रहा।’

सब कुछ पा लेने के बाद ‘आगे क्या?’ का यह शून्यवाद उन्हें भीतर ही भीतर खा रहा था। उनके परिवार ने एक बार मनोचिकित्सक की मदद लेने की कोशिश भी की, लेकिन उस दौर में मानसिक रोगों के प्रति समाज की समझ बहुत सीमित थी। बातचीत के लिए भारी फीस देने के विचार को उस समय स्वीकार नहीं किया जा सका और गुरु दत्त एक बार फिर अपने एकाकीपन के साथ अकेले रह गए।

अंतिम शॉट और विरासत : 10 अक्टूबर 1964 की वह सुबह भारतीय सिनेमा के लिए एक काला अध्याय लेकर आई। 39 वर्ष की अल्पायु में, नींद की गोलियों के अत्यधिक सेवन के कारण, गुरु दत्त ने इस नश्वर दुनिया को अलविदा कह दिया। उनकी मृत्यु के दृश्य का वर्णन भी किसी फिल्म के ‘क्लाइमेक्स’ जैसा प्रतीत होता है कुर्ता-पाजामा पहने, हाथ में एक अधूरी किताब और चेहरे पर एक गहरी विचार मुद्रा। उनकी मृत्यु एक दुर्घटना थी या आत्महत्या, यह बहस आज भी जारी है, लेकिन सत्य यह है कि एक संवेदनशील कलाकार ने उस ‘बे-हिसी’ (संवेदनहीनता) के आगे घुटने टेक दिए जिससे वे अपनी फिल्मों में लड़ते रहे थे।

 

 

 

संबंधित समाचार