कला शिक्षा और सांस्कृतिक चेतना : नई पीढ़ी के निर्माण की दिशा
पिछले दिनों लखनऊ स्थित ‘लखनऊ पब्लिक वर्ल्ड स्कूल’ द्वारा फ्लोरेसेंस आर्ट गैलरी के सहयोग से ‘नन्हें हाथ, बड़ी रचनाएं’ शीर्षक से एक रचनात्मक क्ले मॉडलिंग कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यशाला का उद्देश्य छोटे विद्यार्थियों को मिट्टी जैसे सहज और अभिव्यक्तिपूर्ण माध्यम से रचनात्मकता, कल्पनाशीलता तथा स्पर्श-आधारित सीखने की प्रक्रिया से जोड़ना था। कला शिक्षा के क्षेत्र में इस प्रकार की कोई भी पहल केवल एक गतिविधि भर नहीं होतीं, बल्कि वे बच्चों के व्यक्तित्व विकास, संवेदनात्मक जागरूकता और सृजनात्मक सोच को विकसित करने का महत्वपूर्ण माध्यम भी बनती हैं।--- सुमन कुमार सिंह
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बच्चों के समग्र विकास का आवश्यक हिस्सा
वास्तव में हाल के वर्षों में यह प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है कि विद्यालयों और महाविद्यालयों में स्थानीय स्तर पर कला एवं संस्कृति से जुड़े आयोजनों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। आज कला प्रदर्शनी, कला कार्यशालाएं, लोककला शिविर, संगीत एवं नाट्य आयोजन जैसे कार्यक्रम अब केवल बड़े सांस्कृतिक केंद्रों अथवा केवल महानगरों तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि छोटे शहरों और जिलों में भी सक्रिय रूप से आयोजित हो रहे हैं। इस परिवर्तन के पीछे कई कारण हैं। एक ओर शिक्षा संस्थान अब यह समझने लगे हैं कि कला शिक्षा बच्चों के समग्र विकास का आवश्यक हिस्सा है, वहीं दूसरी ओर राज्य और केंद्र सरकार की सांस्कृतिक नीतियों ने भी इस दिशा में वातावरण तैयार किया है।
उदाहरण के लिए बिहार में सरकार द्वारा प्रत्येक जिले में सांस्कृतिक पदाधिकारी की नियुक्ति की पहल ने स्थानीय स्तर पर कला-सांस्कृतिक गतिविधियों को नई गति दी है। इन पदाधिकारियों की भूमिका केवल औपचारिक कार्यक्रम आयोजित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि वे स्थानीय कलाकारों, लोककलाओं और सांस्कृतिक परंपराओं को मंच उपलब्ध कराने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप विभिन्न जिलों में लोकनृत्य, लोकसंगीत, चित्रकला, शिल्प और नाट्यकला से जुड़े कार्यक्रम नियमित रूप से आयोजित हो रहे हैं। इससे जहाँ एक ओर स्थानीय कलाकारों और प्रतिभाओं को अपनी कला प्रस्तुत करने का अवसर मिल रहा है, वहीं दूसरी ओर समाज के विभिन्न वर्गों में कला के प्रति रुचि और संवेदनशीलता का विकास भी हो रहा है।
महापुरुषों का दृष्टिकोण
भारतीय संदर्भ में कला और संस्कृति को राष्ट्रनिर्माण की प्रक्रिया से अलग करके नहीं देखा जा सकता। इस संदर्भ में देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद का दृष्टिकोण विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रबल समर्थक थे और उनका मानना था कि किसी भी राष्ट्र की आत्मा उसकी संस्कृति में निहित होती है। अपने लेखों और भाषणों में उन्होंने इस बात पर बल दिया कि भारत की सांस्कृतिक परंपराएं- चाहे वे लोककलाओं में हों या शास्त्रीय कलाओं में हमारी राष्ट्रीय पहचान की आधारशिला हैं। उनका मानना था कि जब कोई समाज अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कट जाता है, तो उसकी राष्ट्रीय चेतना भी कमजोर पड़ जाती है।
इसी विचारधारा को आगे बढ़ाते हुए भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भी कला और संस्कृति को राष्ट्र के बौद्धिक और सामाजिक विकास का महत्वपूर्ण आधार माना। उन्होंने कहा था कि किसी भी सभ्यता की वास्तविक पहचान उसकी कला, साहित्य और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों में दिखाई देती है। नेहरू के समय में ही अनेक राष्ट्रीय सांस्कृतिक संस्थानों की स्थापना हुई, जिनका उद्देश्य भारतीय कला और परंपराओं के संरक्षण तथा प्रसार को सुनिश्चित करना था।
इसी प्रकार राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी भारतीय जीवन में लोककलाओं और हस्तशिल्प की महत्ता को रेखांकित किया था। गांधीजी का मानना था कि भारतीय ग्राम्य जीवन में विकसित कला और शिल्प परंपराएं केवल सौंदर्यबोध की अभिव्यक्ति नहीं हैं, बल्कि वे समाज की आत्मनिर्भरता, श्रम-सम्मान और सांस्कृतिक स्वाभिमान की भी परिचायक हैं।
इन विचारों के आलोक में देखा जाए तो यह स्पष्ट हो जाता है कि कला शिक्षा केवल सौंदर्यबोध विकसित करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह समाज में संवेदनशीलता, रचनात्मकता और सांस्कृतिक चेतना को विकसित करने का भी महत्वपूर्ण साधन है। यदि बच्चों को प्रारंभिक स्तर से ही कला और संस्कृति से जोड़ा जाए, तो उनमें न केवल रचनात्मक सोच का विकास होता है, बल्कि वे अपने समाज और परंपराओं के प्रति भी अधिक जागरूक बनते हैं।
इसी कारण आज यह आवश्यकता और भी अधिक महसूस की जा रही है कि प्राथमिक कक्षाओं से ही छात्रों में कला एवं संस्कृति के प्रति रुचि विकसित की जाए। चित्रकला, मूर्तिकला, संगीत, नृत्य और लोकशिल्प जैसी गतिविधियों को विद्यालयी शिक्षा के साथ समन्वित करने से बच्चों को अपनी अभिव्यक्ति के विविध माध्यम मिलते हैं। इसके साथ-साथ वे भारतीय सांस्कृतिक विरासत से भी परिचित होते हैं।
अंततः यह कहा जा सकता है कि कोई भी राष्ट्र अपनी कला और संस्कृति को अक्षुण्ण रखते हुए ही वैश्विक मंच पर सम्मानजनक उपस्थिति दर्ज करा सकता है। ऐसे में विद्यालयों, सांस्कृतिक संस्थानों, स्थानीय समाज और सरकारों की यह साझा जिम्मेदारी बनती है कि वे कला शिक्षा को प्रोत्साहित करें और नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक धरोहर से जोड़ने के लिए ठोस प्रयास करें। क्योंकि इस प्रयास में आयोजित छोटी-छोटी कार्यशालाएं और सांस्कृतिक गतिविधियां भविष्य में एक सशक्त सांस्कृतिक समाज की नींव तैयार करती हैं।
