Harish Rana Euthanasia: राज्यसभा में उठा इच्छा मृत्यु का मुद्दा, IUML सांसद ने की कानून बनाने की मांग

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Published By Anjali Singh
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दिल्ली। राज्यसभा में सोमवार को आईयूएमएल के एक सदस्य ने सरकार से गंभीर रूप से बीमार एवं लाइलाज मरीजों की देखभाल एवं उनके जीवन के सम्मानपूर्वक अंत के लिए कानून बनाने की मांग की। उन्होंने कहा कि पिछले दो दशकों में विधि आयोग की कई रिपोर्ट और उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के बावजूद संसद ने इस मुद्दे पर अब तक कोई कानून नहीं बनाया है। शून्यकाल के दौरान यह मुद्दा उठाते हुए इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) सांसद हारिस बीरन ने सरकार से 'मेडिकल ट्रीटमेंट ऑफ टर्मिनली इल पेशेंट्स (एंड ऑफ लाइफ केयर) अधिनियम' लाने का आग्रह किया। 

उच्च सदन में केरल का प्रतिनिधित्व कर रहे बीरन ने यह भी मांग की कि देश के हर जिला अस्पताल और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में ऐसे लाइलाज मरीजों के लिए अनिवार्य व्यवस्था की जाए, ताकि उनकी सम्मानजनक और मानवीय देखभाल हो सके। उनकी यह टिप्पणी पिछले सप्ताह आए उच्चतम न्यायालय के उस आदेश के संदर्भ में थी, जिसमें अदालत ने हरीश राणा नामक व्यक्ति के जीवनरक्षक उपकरण हटाने की अनुमति दी थी। 

राणा 2013 में ऊंचाई से दुर्घटनावश गिरने के बाद पिछले 13 वर्षों से स्थायी रूप से निष्क्रिय अवस्था (परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट) में हैं। बीरन के अनुसार, बताया जाता है कि न्यायमूर्ति जमशेद पारदीवाला और न्यायमूर्ति के वी विश्वनाथन की पीठ ने फैसला सुनाते समय मरीज के माता-पिता से कहा था कि वे अपने बेटे को छोड़ नहीं रहे हैं, बल्कि उसे सम्मान के साथ जीने का अवसर दे रहे हैं। सांसद ने कहा कि इस मुद्दे पर लंबे समय से विधायी कार्रवाई नहीं हुई है। 

उन्होंने बताया कि विधि आयोग की 196वीं रिपोर्ट 2006 में आई जिसमें इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) के विषय की विस्तार से समीक्षा की गई थी और एक मसौदा कानून भी प्रस्तावित किया गया था, लेकिन संसद ने उस पर कोई कार्रवाई नहीं की। उन्होंने कहा कि बाद में 2011 में 'अरुणा शानबाग' मामले में दिशानिर्देश बनाने के लिए उच्चतम न्यायालय ने हस्तक्षेप किया। 

इसके बाद 2012 में विधि आयोग की 241वीं रिपोर्ट में फिर से एक विधेयक का मसौदा सुझाया गया। बीरन ने कहा कि 2018 में 'कॉमन कॉज' के मामले में एक संविधान पीठ ने जीवन की गरिमा के अधिकार को मान्यता देते हुए दिशानिर्देश जारी किए थे और स्पष्ट कहा था कि ये केवल तब तक लागू रहेंगे जब तक संसद इस विषय पर कानून नहीं बना देती। 2023 में इन दिशानिर्देशों में संशोधन किया गया। 

उन्होंने कहा कि हालिया फैसले में भी उच्चतम न्यायालय ने उम्मीद जताई है कि संसद इस विषय पर कानून बनाएगी। बीरन ने सवाल उठाया कि उच्चतम न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 21 के आधार पर और कब तक व्यवस्था दे सकता है? उन्होंने कहा कि संविधान के तहत जीवन के अधिकार की व्याख्या अदालतों ने गरिमा के साथ मौत के अधिकार तक भी विस्तृत की है। 

आईयूएमएल सदस्य ने गंभीर रूप से बीमार मरीजों के इलाज से जुड़ी आर्थिक चुनौतियों की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि देश में स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाले कुल खर्च का 65 प्रतिशत से अधिक हिस्सा लोगों को खुद वहन करना पड़ता है, जिससे परिवारों पर भारी वित्तीय बोझ पड़ता है। उन्होंने केरल में 2008 से चल रहे समुदाय आधारित 'उपशामक देखभाल कार्यक्रम' (पैलियेटिव केयर प्रोग्राम) का उदाहरण देते हुए कहा कि यह पूरे देश के लिए एक मॉडल बन सकता है। उनके अनुसार, राज्य की हर ग्राम पंचायत को इस कार्यक्रम के दायरे में लिया गया है और इसमें 500 से अधिक गैर-सरकारी संगठनों को भी जोड़ा गया है।

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