श्रीकृष्ण के प्रेम में दीवानी मीराबाई

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Published By Anjali Singh
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भारत का राजस्थान प्रांत वीरों की खान कहा जाता है, पर इस भूमि को श्रीकृष्ण के प्रेम में अपना तन-मन और राजमहलों के सुखों को ठोकर मारने वाली मीराबाई ने भी अपनी चरण रज से पवित्र किया है। हिन्दी साहित्य में रसपूर्ण भजनों को जन्म देने का श्रेय मीरा को ही है। साधुओं की संगत और एकतारा बजाते हुए भजन गाना ही उनकी साधना थी। मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई..गाकर मीरा ने स्वयं को अमर कर लिया।

मीरा का जन्म मेड़ता के राव रत्नसिंह के घर 23 मार्च, 1498 को हुआ था। जब मीरा तीन साल की थी, तब उनके पिता का और दस साल की होने पर माता का देहांत हो गया। जब मीरा बहुत छोटी थी, तो एक विवाह के अवसर पर उसने अपनी मां से पूछा कि मेरा पति कौन है? माता ने हंसी में श्रीकृष्ण की प्रतिमा की ओर इशारा कर कहा कि यही तेरे पति हैं। भोली मीरा ने इसे ही सच मानकर श्रीकृष्ण को अपने मन-मन्दिर में बैठा लिया।

माता और पिता की छत्रछाया सिर पर से उठ जाने के बाद मीरा अपने दादा राव दूदाजी के पास रहने लगीं। उनकी आयु की बालिकाएं जब खेलती थीं, तब मीरा श्रीकृष्ण की प्रतिमा के सम्मुख बैठी उनसे बात करती रहती थी। कुछ समय बाद उसके दादा जी भी स्वर्गवासी हो गए। अब राव वीरमदेव गद्दी पर बैठे। उन्होंने मीरा का विवाह चित्तौड़ के प्रतापी राजा राणा सांगा के बड़े पुत्र भोजराज से कर दिया। इस प्रकार मीरा ससुराल आ गई, पर अपने साथ वह अपने इष्टदेव श्रीकृष्ण की प्रतिमा लाना नहीं भूली।

मीरा की श्रीकृष्ण भक्ति और वैवाहिक जीवन सुखपूर्वक बीत रहा था। राजा भोज भी प्रसन्न थे, पर दुर्भाग्यवश विवाह के दस साल बाद राजा भोजराज का देहांत हो गया। अब तो मीरा पूरी तरह श्रीकृष्ण को समर्पित हो गईं। उनकी भक्ति की चर्चा सर्वत्र फैल गई। दूर-दूर से लोग उनके दर्शन को आने लगे। पैरों में घुंघरू बांध कर नाचते हुए मीरा प्रायः अपनी सुधबुध खो देती थीं।

मीरा की सास, ननद और राणा विक्रमाजीत को यह पसंद नहीं था। राज-परिवार की पुत्रवधू इस प्रकार बेसुध होकर आम लोगों के बीच नाचे और गाए, यह उनकी प्रतिष्ठा के विरुद्ध था। उन्होंने मीरा को समझाने का प्रयास किया, पर वह तो सांसारिक मान-सम्मान से ऊपर उठ चुकी थीं। उनकी गतिविधियों में कोई अंतर नहीं आया। अंततः राणा ने उनके लिए विष का प्याला श्रीकृष्ण का प्रसाद कह कर भेजा।

मीरा ने उसे पी लिया, पर सब हैरान रह गए, जब उसका मीरा पर कुछ असर नहीं हुआ। राणा का क्रोध और बढ़ गया। उन्होंने एक काला नाग पिटारी में रखकर मीरा के पास भेजा, पर वह नाग भी फूलों की माला बन गया। अब मीरा समझ गई कि उन्हें मेवाड़ छोड़ देना चाहिए। अतः वह पहले मथुरा-वृंदावन और फिर द्वारका आ गईं। इसके बाद चित्तौड़ पर अनेक विपत्तियां आईं।

राणा के हाथ से राजपाट निकल गया और युद्ध में उनकी मृत्यु हो गई। यह देखकर मेवाड़ के लोग उन्हें वापस लाने के लिए द्वारका गए। मीरा आना तो नहीं चाहती थी, पर जनता का आग्रह वे टाल नहीं सकीं। वे विदा लेने के लिए रणछोड़ मंदिर में गईं, पर पूजा में वे इतनी तल्लीन हो गईं कि वहीं उनका शरीर छूट गया। इस प्रकार 1573 ई. में द्वारका में ही श्रीकृष्ण की दीवानी मीरा ने अपनी देहलीला समाप्त की।-सुरेश बाबू मिश्रा ,साहित्य भूषण,बरेली ।

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