टिकुली पेंटिंग: परंपरा से आधुनिक कला तक की रचनात्मक यात्रा
बिहार में प्रचलित टिकुली पेंटिंग एक ऐसी विशिष्ट लोक कला परंपरा है, जिसकी जड़ें भारतीय सांस्कृतिक इतिहास में गहराई तक समाई हुई हैं। इसका संबंध केवल चित्रकला से ही नहीं, बल्कि भारतीय स्त्री-सौंदर्य, सामाजिक परंपराओं और व्यापारिक इतिहास से भी जुड़ा हुआ है। माना जाता है कि टिकुली कला की प्रेरणा प्राचीन काल से ही मौजूद रही है और इसका इतिहास कुछ विद्वानों के अनुसार बौद्ध काल तक जाता है, हालांकि इसके उद्भव की कोई निश्चित तिथि निर्धारित करना आज भी कठिन है।
बिंदी या टिकुली लगाने की परंपरा सदियों पुरानी
भारतीय संस्कृति में सुहागन स्त्रियों द्वारा ललाट पर बिंदी या टिकुली लगाने की परंपरा सदियों पुरानी रही है। यह केवल सौंदर्य वृद्धि का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक और धार्मिक पहचान का भी प्रतीक रही है। पुरातत्वविदों को उत्खनन में प्राप्त मौर्यकालीन नारी प्रतिमाओं के ललाट पर बिंदी के अंकन मिलते हैं, जिससे यह अनुमान लगाया जाता है कि यह परंपरा कम से कम मौर्य काल से चली आ रही है। समय के साथ यह परंपरा समाज में निरंतर बनी रही और धीरे-धीरे इससे संबंधित शिल्प और सजावटी वस्तुओं का भी विकास हुआ।
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का हिस्सा
मध्यकालीन भारत में बिहार की राजधानी पटना एक महत्वपूर्ण व्यापारिक और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में उभर चुकी थी। प्रसिद्ध फ्रांसीसी यात्री और इतिहासकार जीन-बैप्टिस्ट टैवर्नियर ने अपने यात्रा विवरणों में उल्लेख किया है कि लगभग 1700 ईसवी तक पटना पूरे बंगाल क्षेत्र का एक प्रमुख महानगर बन गया था। उस समय पुर्तगाली और तिब्बती व्यापारी यहां नियमित रूप से व्यापार के लिए आते थे और स्थानीय उत्पादों जैसे मूंग, कछुए के खोल से बने आभूषण, चूड़ियां तथा सोने-चांदी से सजी टिकुलियां खरीदकर अपने देशों में ले जाते थे। यह तथ्य बताता है कि टिकुली केवल घरेलू उपयोग तक सीमित नहीं रही, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का भी हिस्सा बन चुकी थी।
प्रारंभिक दौर में टिकुली मुख्यतः कांच या धातु पर बनाई जाती थी और उस पर सोने की वर्क या रंगीन सजावट की जाती थी, लेकिन आधुनिक टिकुली पेंटिंग का स्वरूप 20 वीं सदी के मध्य में विकसित हुआ। प्रसिद्ध कलाकार और शिल्प पुनरुद्धारक उपेंद्र महारथी ने इस कला को नया जीवन देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1960 के दशक में जापान यात्रा के दौरान उन्होंने वहां लकड़ी के पैनलों पर एनामेल पेंट से बिंदुओं को जोड़कर बनाए जा रहे चित्रों को देखा। इस तकनीक से प्रेरित होकर, उन्होंने पटना के कांच पर चित्रकारी करने वाले कारीगरों रामफल गुप्ता, लाल बाबू गुप्ता तथा अन्य शिल्पियों को इस शैली को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया।
एक नई पहचान
इस पहल के परिणामस्वरूप टिकुली पेंटिंग ने एक नई पहचान प्राप्त की। इसमें पौराणिक कथाओं, लोकजीवन, नृत्य, प्रकृति और सामाजिक विषयों को आकर्षक रंगों तथा बारीक रेखांकन के माध्यम से प्रस्तुत किया जाने लगा। एनामेल रंगों के प्रयोग ने इन चित्रों को टिकाऊ, चमकदार और बाजार-उपयुक्त बनाया। महारथी जी के निधन के बाद इस परंपरा को आगे बढ़ाने और पुनर्जीवित करने का महत्वपूर्ण दायित्व कलाकार अशोक कुमार विश्वास ने निभाया।
उन्होंने न केवल पारंपरिक विषयों को संरक्षित किया, बल्कि आधुनिक डिजाइन और बाजार की मांग के अनुरूप नए प्रयोग भी किए। उनके प्रयासों से टिकुली पेंटिंग राज्य की सीमाओं से बाहर निकलकर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों तक पहुंची। आज अनेक प्रशिक्षण कार्यक्रमों और शिल्प मेलों के माध्यम से नई पीढ़ी के कलाकार इस कला में दक्ष हो रहे हैं।
वर्तमान संदर्भ में टिकुली पेंटिंग केवल सजावटी वस्तु या स्मृति-चिह्न भर नहीं रह गई है, बल्कि यह बिहार की सांस्कृतिक पहचान और आत्मनिर्भर शिल्प अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म, डिजाइन नवाचार और सरकारी प्रोत्साहन योजनाओं ने इसके प्रसार को और गति दी है। इस प्रकार, सुहागिनों के ललाट की शोभा रही टिकुली आज एक सशक्त कला शैली के रूप में विकसित होकर परंपरा और आधुनिकता के सुंदर समन्वय का उदाहरण प्रस्तुत कर रही है। -सुमन कुमार सिंह कलाकार/कला लेखक
