मैदानों में तबाही मचा सकते हैं पिघलते ग्लेशियर, शोध में तीव्र क्षरण सामने आने पर विशेषज्ञों ने चेताया, बढ़ता जाएगा बाढ़ का खतरा
लखनऊ, अमृत विचार: हिमालयी इलाकों में खासकर जलवायु परिवर्तन के कारण पिघल रहे ग्लेशियर मैदानी इलाकों के लिए तबाही का कारण बन सकते हैं। नदियों का जलस्तर बढ़ते जाने से बाढ़ का खतरा के साथ ही बसावट से लेकर कृषि और अन्य संसाधन प्रभावित होंगे। भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक नए अध्ययन में हिमालयी ग्लेशियरों के तेज़ी से पिघलने और क्षेत्र में ग्लेशियल झीलों से उत्पन्न बाढ़ के बढ़ते खतरे को उजागर किया गया है।
इस शोध का नेतृत्व लखनऊ विश्वविद्यालय के भूविज्ञान विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. विनीत कुमार व पूर्व वैज्ञानिक डीवाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी ने किया है। उनके साथ डॉ. मनीष मेहता और डॉ. अजय सिंह राणा भी अध्ययन में शामिल रहे हैं। यह शोध अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठित जर्नल प्रोग्रेस इन फीजिकल जीयोग्राफी अर्थ एंड एंवायरमेंट में प्रकाशित किया गया है।
अध्ययन में ज़ांस्कर के पदम घाटी स्थित पदम ग्लेशियर का अध्ययन किया गया और इसकी तुलना निकटवर्ती नाला ग्लेशियर से की गई है। वैज्ञानिकों ने पाया कि झील से जुड़े पदम ग्लेशियर का क्षरण, भूमि-आधारित नाला ग्लेशियर की तुलना में कहीं अधिक तेज़ी से हो रहा है।
पदम झील का आकार 69 प्रतिशत बढ़ा
शोध में यह सामने आया है कि 1993 से 2022 के बीच पदम ग्लेशियर उल्लेखनीय रुप से पीछे हटते हुए दर्ज किया गया है। इसके क्षेत्रफल में बड़ी कमी आई, जबकि नातियो (ढलान) नाला ग्लेशियर में अपेक्षाकृत धीमे परिवर्तन देखे गए। निष्कर्ष यह है कि पदम ग्लेशियर के अग्रभाग पर स्थित ग्लेशियल झील (पदम झील) का आकार लगभग 69 प्रतिशत तक बढ़ गया है।
ये भी पढ़ें :
Hanuman Jayanti: साल में दो बार हनुमान जयंती मनाने की परंपरा, रामनगरी में विधि विधान से धार्मिक अनुष्ठान और उत्सव
