2 हजार साल प्राचीन है इतिहास लिए लखनऊ का ये गांव, मिले गुप्तकालीन और कुषाणकालीन अवशेष 

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Published By Anjali Singh
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लखनऊ, अमृत विचार: मोहनलालगंज रोड पर स्थित हुलासखेड़ा गांव लखनऊ शहर से भी दो हजार वर्ष पुराना है। इसके प्रमाण भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) की खुदाई में मिले हैं। इस गांव के नीचे करीब दो हजार वर्ष पुराने गुप्तकालीन और कुषाणकालीन अवशेष और उन्नत नगरीय सभ्यता की दीवार मिली है।

नबाव आसिफुदौल्ला ने 1775 में लखनऊ की स्थापना की थी, जबकि पुरातत्व विद इससे भी दो हजार वर्ष पूर्व हुलासखेड़ा में उन्नत नगरीय सभ्यता विकसित होना मान रहे हैं। मंगलवार को नेशनल पीजी कॉलेज के स्नातक इतिहास के छात्रों ने हुलासखेड़ा में उत्खनन स्थल पर बारीकियों को समझा। दल विभागाध्यक्ष डॉ. आकृति के पर्यवेक्षण में पहुंचा था। शैक्षणिक प्रशिक्षण के अंतर्गत छात्रों को रिमोट सेंसिंग और जीपीएस तकनीक के सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक उपयोग से भी परिचित कराया गया।

हुलासखेड़ा से मिले महत्वपूर्ण साक्ष्य

हुलासखेड़ा स्थल से कुषाण कालीन कलाकृतियां व प्रारंभिक गुप्त कालीन बस्तियों के प्रमाण मिले हैं। इस स्थल से प्राप्त कुषाण कालीन कार्तिकेय की मूर्ति ने इस स्थल के काल निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके अतिरिक्त, कुषाण काल के दो बड़े पात्र भी उत्खनन में प्राप्त हुए हैं, जिन्हें वर्तमान में स्थल के समीप स्थित संग्रहालय में संरक्षित किया गया है, हालांकि संग्रहालय अभी निर्माणाधीन अवस्था में है।

प्राचीन दबे हुए नगर के मिले अवशेष

यहां पर उत्खनन के पश्चात प्राचीन दबे हुए नगर की दीवारों के अवशेष भी मिले हैं। इस खोज ने यह स्पष्ट किया कि पुरातात्विक स्थल किस प्रकार प्राचीन नगरीय संरचनाओं की समझ को पुनः स्थापित करते हैं।

कुषाण काल और गुप्तकाल

गुप्तकाल में समुद्रगुप्त के शासनकाल को स्वर्ण युग कहा जाता है, जब भारतवर्ष साहित्य, विज्ञान और आर्थिक उन्नति के चरमोत्कर्ष पर था। समुद्रगुप्त को भारत का नेपोलियन कहा गया क्यों कि उसने दक्षिणापथ अभियान से दक्षिण क्षेत्रों को समाहित कर लिया था। इसी कालखंड में कालीदास जैसे महाकवियों ने अपनी रचनाएं की और वात्सायन जैसे मुखर और उदार रचनाकार भी हुए। इस कालखंड को 320-550 ई. का माना गया है। जबकि कुषाण काल 30 ईस्वी से लेकर करीब 375 ईस्वी तक माना जाता है।

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