आस्था, परंपरा का अद्भुत संगम चैती मेला
गोला गोकर्णनाथ की पावन धरती पर जब चैत्र की मंद बयार बहती है, तो वातावरण में भक्ति, उल्लास और लोकजीवन की मधुर गूंज एक साथ सुनाई देने लगती है। गोकर्णनाथ महादेव मंदिर की घंटियों की अनुगूंज के बीच सजी यह नगरी मानो समय के किसी प्राचीन अध्याय में प्रवेश कर जाती है, जहां हर कदम पर आस्था की छाप और हर चेहरे पर उत्सव की आभा झलकती है।
इसी पावन भूमि पर सदियों से सजी आ रही है चैती मेले की वह परंपरा, जिसने समय के साथ न केवल अपनी पहचान बनाई, बल्कि लोकसंस्कृति के संरक्षण का एक जीवंत माध्यम भी बन गई। वर्ष 2026 में यह मेला अपने 121 वें वर्ष में प्रवेश करते हुए इतिहास और वर्तमान के अद्भुत संगम का साक्षी बन रहा है। यह मेला केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि भावनाओं, रंगों और रचनात्मकता का विशाल उत्सव है। यहां जब लोकगायक अपनी स्वर लहरियों में गांव की मिट्टी की महक घोलते हैं, तो श्रोता अनायास ही उस सांस्कृतिक विरासत में डूब जाते हैं। काव्य गोष्ठियों में शब्दों की सरिता बहती है, तो नाट्य मंचन और नृत्य प्रस्तुतियां जीवन के विविध रंगों को साकार करती हैं।
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मेले की गलियों में चलते हुए ऐसा प्रतीत होता है मानो हर दुकान, हर झूला, हर स्वर किसी कहानी का हिस्सा हो। एक ऐसी कहानी, जो पीढ़ियों से कही-सुनी जाती रही है। लकड़ी से बनी वस्तुएं, क्राकरी, हस्तशिल्प की निपुणता और सोफ्टी का स्वाद इस मेले को केवल व्यापार का नहीं, बल्कि जीवन के उत्सव का केंद्र बना देती है। भीड़ का बढ़ता सैलाब यह बताता है कि बदलते समय के बावजूद इस मेले की आत्मा आज भी वैसी ही है, अडिग, जीवंत और आत्मीय। यहां आने वाला हर व्यक्ति केवल दर्शक नहीं रहता, बल्कि इस परंपरा का एक हिस्सा बन जाता है। बहरहाल, गोकर्णनाथ का चैती मेला केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि समय की धारा में बहती वह सांस्कृतिक कविता है, जो हर वर्ष नए भाव, नए रंग और नई ऊर्जा के साथ जनमानस को जोड़ती है और यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है।
पहली बार पर्यटन विभाग से मिले 40 लाख रुपये नगर पालिका परिषद का ऐतिहासिक चैती मेला करीब 121 साल पुरानी परंपरा है, लेकिन पहली बार पर्यटन विभाग ने 40 लाख रुपये की धनराशि स्वीकृत की है। यह राशि जिला पर्यटन एवं संस्कृति परिषद लखीमपुर खीरी को जारी होने से मेले की व्यवस्थाएं अब और अधिक व्यवस्थित, आकर्षक और दर्शनीय हो गई हैं। इस धनराशि के पारदर्शी उपयोग के लिए डीएम दुर्गा शक्ति नागपाल ने एक समिति गठित कर दी है, जिसकी कमान एडीएम नरेंद्र बहादुर सिंह को अध्यक्ष के रूप में सौंपी गई है। समिति में वरिष्ठ कोषाधिकारी, एसडीएम गोला, पीडी-डीआरडीए, पर्यटन अधिकारी और ईओ गोला को सदस्य बनाया गया है।- विकास शुक्ल लखीमपुर खीरी
शिव मंदिर कॉरिडोर से बढ़ेगा मेले का आकर्षण
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चैती मेला की परंपरा के पीछे गहरी आस्था जुड़ी हुई है। होली के बाद बड़ी संख्या में श्रद्धालु मां पूर्णागिरि के दर्शन के लिए जाते हैं और वहां से लौटकर छोटी काशी में भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। इसी धार्मिक परंपरा के चलते हर वर्ष श्रद्धालु मां पूर्णागिरि से लौटकर यहां पहुंचते हैं, शिव मंदिर में जल चढ़ाते हैं और फिर मेले का आनंद लेते हैं। यही कारण है कि सावन मेले के बाद चैती मेले का भी विशेष महत्व माना जाता है। इस बीच पौराणिक शिव मंदिर कॉरिडोर का निर्माण कार्य तेजी से जारी है, जो मुख्यमंत्री की महत्वाकांक्षी परियोजनाओं में शामिल है।
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कॉरिडोर के तहत मंदिर के परिक्रमा मार्ग का निर्माण 108 स्तंभों पर किया जा रहा है। इसके पूर्ण होने पर मुख्य मंदिर के साथ ही कुल 11 मंदिरों का निर्माण भी कराया जाएगा। स्थानीय जानकारों का मानना है कि कॉरिडोर निर्माण पूरा होने के बाद सावन और चैती मेले में श्रद्धालुओं की संख्या में काफी वृद्धि होगी, जिससे धार्मिक पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा।
सांस्कृतिक मंच पर स्थानीय प्रतिभाओं को मिलता है मौका
नगर पालिका परिषद के सांस्कृतिक मंच पर स्थानीय प्रतिभाओं को मौका मिलता है। यहां लोक कला और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की भरमार रहती है। काव्य गोष्ठियां, लोक गायन, नृत्य, नाट्य मंचन, शायरी और स्कूली बच्चों के कार्यक्रम इस मेले को जीवंत बना देते हैं। यह मंच स्थानीय और क्षेत्रीय प्रतिभाओं को अपनी कला दिखाने का सुनहरा अवसर देता है।
इतिहास की पगडंडियों पर चैती मेला
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प्राचीन अभिलेखों में इसका उल्लेख 1905 से पूर्व भी एक पारंपरिक मेले के रूप में मिलता है।
▪️वर्ष 1905 में ब्रिटिश शासन के दौरान इसे औपचारिक स्वरूप मिला और नियमबद्ध आयोजन शुरू हुआ।
1877 में यहां लगभग एक लाख लोगों की उपस्थिति दर्ज की गई थी।
1905 तक यह संख्या बढ़कर डेढ़ लाख के आसपास पहुंच गई।
वर्ष 1936 तक इसका संचालन नगर समिति के अधीन रहा।
1945 में नगर पालिका परिषद के गठन के बाद से यह मेला उसी के संरक्षण में निरंतर आयोजित हो रहा है।
वर्तमान में हर वर्ष दो से ढाई लाख श्रद्धालु इस मेले में सम्मिलित होते हैं।
चैती मेला हमारी सांस्कृतिक विरासत और आस्था का जीवंत प्रतीक है। यह मेला न केवल श्रद्धालुओं के लिए धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि क्षेत्र की सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक गतिविधियों को भी नई ऊर्जा प्रदान करता है। नगर पालिका परिषद द्वारा मेले में आने वाले श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए स्वच्छता, पेयजल, प्रकाश व्यवस्था, सुरक्षा और यातायात प्रबंधन के व्यापक इंतजाम किए गए हैं। हमारा प्रयास है कि हर आगंतुक को सुरक्षित, सुव्यवस्थित और सुखद अनुभव मिले। सभी श्रद्धालुओं से अपील है कि व्यवस्था बनाए रखने में सहयोग करें और इस पावन आयोजन को सफल बनाएं।
-विजय शुक्ल रिंकू, अध्यक्ष नगर पालिका परिषद गोला
