अनोखी परंपरा: थापों में बसी विदाई, आदिवासी जीवन का सत्य
राजस्थान के दक्षिणी हिस्से में स्थित बांसवाड़ा का आदिवासी जीवन अपनी विशिष्ट परंपराओं और गहरी लोकमान्यताओं के लिए जाना जाता है। यहां जीवन के हर पड़ाव जन्म से लेकर मृत्यु तक संस्कारों की एक अलग ही छवि देखने को मिलती है। विशेष रूप से मृत्यु से जुड़े रीति-रिवाज इस समाज की सांस्कृतिक पहचान को बेहद अनोखे ढंग से सामने लाते हैं। जब किसी व्यक्ति का निधन होता है, तो शोक की सूचना देने का तरीका आधुनिक साधनों से बिल्कुल अलग और पारंपरिक होता है। ढोली समाज का एक सदस्य शोकग्रस्त परिवार के घर पहुंचकर ढोल बजाता है। यह ढोल साधारण नहीं होता, बल्कि इसकी थाप विशेष होती है, जिसे स्थानीय लोग ‘मुर्दा ढोल’ के नाम से पहचानते हैं।
इसकी गूंज पूरे गांव में फैलते ही लोगों को समझ आ जाता है कि किसी के घर शोक हुआ है। इस तरह बिना किसी शब्द के ही सूचना पूरे क्षेत्र में पहुंच जाती है। ढोल की आवाज केवल सूचना का माध्यम ही नहीं, बल्कि सामूहिक सहभागिता का आह्वान भी होती है। जहां तक इसकी ध्वनि सुनाई देती है, वहां तक के ग्रामीण स्वतः ही शवयात्रा में शामिल होने के लिए निकल पड़ते हैं। ढोल बजाने वाला व्यक्ति अर्थी के साथ श्मशान घाट तक आगे-आगे चलता है, मानो वह पूरे गांव को अंतिम विदाई के इस मार्ग में साथ ले जा रहा हो।
अंतिम संस्कार से पहले एक और विशिष्ट परंपरा निभाई जाती है-ढोल की थाप के साथ पटाखे फोड़ना या हवा में बंदूक चलाना। यह दृश्य शोक के बीच भी एक सम्मानजनक विदाई का प्रतीक बन जाता है। आदिवासी समाज में यह मान्यता रही है कि हर व्यक्ति, चाहे वह कितना ही साधारण क्यों न हो, अपने जीवन में एक सिपाही की तरह संघर्ष करता है। इसलिए उसकी मृत्यु पर बंदूक की सलामी देकर उसे श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है।
इन परंपराओं की जड़ें उस समय से जुड़ी हैं, जब संचार के आधुनिक साधन उपलब्ध नहीं थे। तब ढोल और अन्य वाद्ययंत्र ही सूचना के प्रमुख माध्यम हुआ करते थे। बांसवाड़ा जैसे क्षेत्रों में, जहां बस्तियां दूर-दूर बसी हैं, वहां यह तरीका आज भी प्रासंगिक बना हुआ है। भले ही नई पीढ़ी इन परंपराओं के मूल कारणों को पूरी तरह न समझती हो, लेकिन वर्षों से इन्हें देख-सुनकर उन्होंने इन्हें अपने जीवन का हिस्सा बना लिया है। यही कारण है कि बांसवाड़ा की यह आज भी जीवंत है और समाज की सामूहिक चेतना को एक सूत्र में बांधे हुए है।
