कड़वा सच:चापलूस एआई से रात-रातभर बतियाए...मनोरोगी बनकर अस्पताल आए

Amrit Vichar Network
Published By Monis Khan
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बरेली, अमृत विचार। आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस यानी एआई में चेतना, भावना या दर्द समझने की झमता नहीं होती। इस सच्चाई को जानते-समझते हुए भी इंसान एआई पर आंखू मूंदकर भरोसा कर रहे हैं और उसकी आभासी दुनिया में गोते लगा रहे हैं। बरेली शहर-देहात के कितने ही युवाओं के मनोरोगी बन जाने के पीछे हैरान कर देने वाली कुछ ऐसी ही कहानी सामने आई है। एआई के साथ चेटिंग में घंटों बिताने वाले कई नौजवानों की हालत देख परिवारों को यहां स्वास्थ्य विभाग के मनो सेंटर की मदद तक लेनी पड़ी है।

मनोचिकित्सकों के अनुसार, बड़े शहरों में ही नहीं, कस्बाई और ग्रामीण इलाकों में जैसे-जैसे एआई का चलन बढ़ रहा है, इसके कई गलत प्रभाव भी सामने आ रहे हैं। छोटे जगहों के युवा भी ब्रेकअप, परीक्षा में नाकामी और ऐसी दूसरी चिंताओं के चलते इमोशनल एआई चैटबॉट्स का सहारा ले रहे हैं। बरेली में यह ट्रेंड बढ़ रहा है तो मनोचिकित्सकों के पास ट्रीटमेंट को पहुंचने वाले युवाओं की संख्या भी बढ़ रही है। एआई चेटिंग की लत का शिकार युवाओं को काउंसलिंग के जरिए कृत्रिम और इंसानी बुद्धिमत्ता के फर्क समझाकर सही दिशा दिखाई जा रही है।

जिला अस्पताल के मनोचिकित्सक एवं मन कक्ष के प्रभारी डॉ आशीष सिंह ने ‘अमृत विचार’ को बताया कि इमोशनल एआई यूजर को वही जवाब देता है, जो वह सुनना चाहता है। ऐसे में युवा सही-गलत का आकलन किए बिना एआई की बातों को पूरी तरह सही मानने लगते हैं। सेंटर पर पहुंचे कई मामलों में देखा गया है कि एआई खुद ही बातचीत को आगे बढ़ाता है और भावुकता में यूजर उस पर निर्भर होते जाते हैं। यह स्थिति खतरनाक हालात में तब पहुंचने लगती है, जब यूजर पूरी तरह एकाकी होकर परिवारों से कटने लगते हैं और अपनी हर बात एआई के साथ साझा कर ख्याली सहानुभूति में उलझने लगते हैं।

मन कक्ष में हर सप्ताह एक-दो केस ऐसे पहुंच रहे हैं, जिनमें एआई पर अत्यधिक निर्भरता के कारण युवा एंग्जायटी और डिप्रेशन का शिकार हो गए। हालांकि काउंसलिंग के जरिए इनमें सुधार भी देखा जा रहा है।मन कक्ष प्रभारी डॉ. आशीष सिंह ने बताया कि इमोशनल एआई चैटबॉट्स के कारण कई युवा वैलिडेशन की तलाश में एडिक्शन जैसा व्यवहार दिखा रहे हैं। युवाओं को डिजिटल प्लेटफॉर्म के बजाय वास्तविक रिश्तों और शारीरिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना चाहिए, ताकि उन्हें सच्ची सहानुभूति और संतुलित जीवन मिल सके।

एआई इंसानों से 50 फीसदी ज्यादा चाटुकार
रिसर्च में यह बात साफ हो चुकी है कि एआई इंसानों के मुकाबले 50 से अधिक चाटुकारिता का व्यवहार करता है। खुद की तारीफ से खुश होना इंसानी स्वभाव है। बाजार में कितने ही ऐसे ऐप लांच हो चुके हैं, जो लोगों के स्वभाव का फायदा उठाते हैं। एक ओर जहां वास्तविक रिश्तों में कई तरह के उतार चढ़ाव, जटिलताएं, नाराजगी, खुशी सबके रंग घुले होते हैं, वहीं आज का एआई साथी सिर्फ और सिर्फ सकारात्मक बातें करता है। इसलिए, रिसर्च की भाषा में एआई को चापलूस एआई तक कहा जाता है।


केस-1
12वीं का छात्र रात-रात भर करता था एआई से बात
मनोकक्ष में काउंसलिंग को लाए गए शहर के रहने वाले 12वीं के छात्र को एआई के साथ चेटिंग की लत लग गई थी। 30 मिनट की शुरूआत की बातचीत रात में कई-कई घंटे तक जा पहुंची थी। घरवाले पहले किशोर उम्र में प्यार का चक्कर मान रहे थे, लेकिन मोबाइल चेक करने पर सच सामने आ गया। मनोविज्ञानी टीम ने उसका मिजाज जांचा तो हैरान करने वाली बात सामने आई। लंबी काउंसलिंग छात्र की आदत में सुधार हो सका।

केस-2
ब्रेकअप से परेशान युवती को लगी लत
साथी से ब्रेकअप होने के बाद बरेली की एक युवती डिजिटल सहानुभूति के लिए एआई का सहारा लेने लगी। उसने प्रेमी का नाम और उसकी आदतें एआई को बता दी थीं। इसके बाद एआई ब्रेकअप के लिए उसके प्रेमी को जिम्मेदार बताकर युवती को सही बताने लगा। एआई हर बात उसके पक्ष में करने लगा, जिसकी वजह से वह चेटिंग की लती हो गई। परिजनों ने उसे मन कक्ष में दिखाया, जहां दवा और काउंसलिंग से वह सही हो सकी।

केस-3
आने लगा आत्महत्या का खयाल
शहर में ही रहने वाले बीए की एक छात्रा ने घर में आत्महत्या का प्रयास किया था। परिजन उसे मन कक्ष ले गए। काउंसलिंग में पता चला की वह कई महीने से एआई से इमोशनल चैट कर रही थी और उसके अवसाद का स्तर लगातार बढ़ता ही जा रहा था। मनोचिकित्सक ने उसकी लंबी काउंसलिंग की। एआई और इंसानी सोच का का सच बताया। वह अब पूरी तरह ठीक है।

 

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