बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पति की उपस्थिति सुनिश्चित करने का साधन नहीं : हाईकोर्ट

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Published By Deepak Mishra
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प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक निर्णय में कहा है कि भरण पोषण मामले में वारंट से कथित तौर पर बच रहे पति की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का उपयोग साधन के तौर पर नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की पीठ ने इस टिप्पणी के साथ संगीता यादव नाम की महिला द्वारा दायर याचिका खारिज कर दी। 

अदालत ने कहा कि यह संबंधित परिवार अदालत पर है कि वह ऐसे मामलों में पति की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए दंडात्मक उपाय शुरू करे। महिला ने मौजूदा बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के जरिए भरण पोषण के मामले में वारंट से बच रहे अपने पति का पता लगाने, उसे गिरफ्तार करने और पेश करने का निर्देश जारी करने का अनुरोध किया था। 

इस मामले के तथ्य के मुताबिक, जनवरी, 2021 में आजमगढ़ की परिवार अदालत ने पति को पत्नी और बेटी को गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया था। हालांकि, पति ने गुजारा भत्ता नहीं दिया और वह कहां है, इस बारे में किसी को जानकारी नहीं है। अपनी याचिका में पत्नी ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका में प्रतिवादी अधिकारियों को पति को उच्च न्यायालय के समक्ष या आजमगढ़ की परिवार अदालत के प्रधान न्यायाधीश के समक्ष पेश करने का निर्देश देने की प्रार्थना की थी। 

उसने अदालत से गुहार लगाई थी कि उसके पति को गिरफ्तार कर परिवार अदालत को सौंपा जाए ताकि अदालत उससे बकाया गुजारा भत्ता की वसूली की कार्यवाही कर सके। याचिकाकर्ता ने इसके लिए एमपी नागलक्ष्मी बनाम पुलिस उपायुक्त मामले में मद्रास उच्च न्यायालय के निर्णय को आधार बनाया। 

हालांकि पीठ ने कहा कि उस मामले में पति, याचिकाकर्ता के ससुर की अवैध हिरासत में था। अदालत ने 25 मार्च को दिए अपने आदेश में कहा कि महज इसलिए कि पति अपनी पत्नी और बेटी को गुजारा भत्ता देने के लिए परिवार अदालत द्वारा जारी वारंट से बच रहा है, बंदी प्रत्यक्षीकरण की प्रकृति में निर्देश जारी नहीं किया जा सकता। 

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