संपादकीय: वार्ता का प्रतिफल

Amrit Vichar Network
Published By Monis Khan
On

अमेरिका-ईरान के बीच इस्लामाबाद में प्रस्तावित वार्ता निर्णायक मोड़ साबित होगी या फिर एक और अस्थायी ठहराव इसका जवाब बहुत मुश्किल है, क्योंकि जमीन पर तनाव अभी भी चरम पर है। क्या यह युद्धविराम आगे बढ़ेगा? फिलहाल तो इसी पर खतरा नजर आता है। सच यह है कि दोनों पक्ष फिलहाल ‘रणनीतिक विराम’ के ही पक्ष में लगते हैं। अमेरिका को अपने सैन्य और कूटनीतिक विकल्पों को पुनर्गठित करने का समय चाहिए, जबकि ईरान भी प्रतिरोध की अपनी क्षमता को बनाए रखते हुए अंतर्राष्ट्रीय दबाव कम करना चाहता है। अतः युद्धविराम का सीमित विस्तार संभव है, पर स्थायी शांति की संभावना नहीं के बराबर। 

दोनों पक्षों के मूल रुख में बदलाव के संकेत नहीं हैं। ईरान स्पष्ट कर चुका है कि वह अपने परमाणु कार्यक्रम और होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण से पीछे नहीं हटेगा। दूसरी ओर, अमेरिका के लिए परमाणु प्रसार और समुद्री व्यापार की निर्बाधता ‘रेड लाइन’ है। ऐसे में समझौता केवल ‘टैक्टिकल एडजस्टमेंट’ के रूप में ही संभव है, न कि मूल मुद्दों के समाधान के रूप में। इजराइल की भूमिका इस पूरे परिदृश्य में जटिल और कुछ हद तक अलग-थलग दिखाई देती है। सतह पर भले अमेरिका-इजराइल की एकजुटता दिखे, पर युद्ध और युद्धविराम को लेकर दोनों के दृष्टिकोण में सूक्ष्म अंतर स्पष्ट है। 

इजराइल जहां निर्णायक सैन्य बढ़त को बनाए रखना चाहता है, वहीं अमेरिका व्यापक क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक दबावों को ध्यान में रखकर संयम दिखाना चाहता है। यही कारण है कि लेबनान और गाजा जैसे मोर्चों पर जारी तनाव शांति प्रयासों को कमजोर करता है। होर्मुज का प्रश्न वार्ता की धुरी है। यदि ईरान नियंत्रण रखते हुए टोल या शर्तें लागू करता है, तो यह वैश्विक ऊर्जा बाजार और समुद्री कानून दोनों के लिए चुनौती होगी। अमेरिका के लिए इसे स्वीकार करना कठिन होगा, पर पूर्ण सैन्य टकराव से बचने के लिए कोई ‘मध्य मार्ग’, जैसे- अंतर्राष्ट्रीय निगरानी खोजा जा सकता है। 

पाकिस्तान की मध्यस्थता पर भी सवाल हैं। एक ओर वह इस्लामाबाद को कूटनीतिक केंद्र बनाने की कोशिश कर रहा है, दूसरी ओर उसकी आंतरिक राजनीति में इसका विरोध इस प्रक्रिया की विश्वसनीयता को प्रभावित करता है। यदि मध्यस्थ पर ही संदेह हो, तो वार्ता की सफलता स्वतः सीमित हो जाती है। अमेरिका की घरेलू राजनीति भी इस समीकरण में महत्वपूर्ण है। डोनाल्ड ट्रंप पर गिरती लोकप्रियता और महाभियोग की आशंकाएं उन्हें आक्रामक बयानबाजी और त्वरित ‘जीत’ की तलाश की ओर धकेल सकती हैं। पर यही जल्दबाजी किसी स्थायी समाधान के रास्ते में बाधा भी बन सकती है। 

यदि वार्ता विफल होती है तो इसका सीधा अर्थ होगा कि क्षेत्र फिर से तीव्र संघर्ष की ओर बढ़ेगा, होर्मुज में अस्थिरता बढ़ेगी और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव आएगा। ऐसी स्थिति में एक संतुलित, विश्वसनीय और तटस्थ शक्ति की आवश्यकता होगी, जहां भारत की भूमिका उभर सकती है। भारत के दोनों पक्षों से संवाद और क्षेत्र में उसके हित उसे संभावित मध्यस्थ बना सकते हैं। इस्लामाबाद वार्ता से चमत्कार की उम्मीद करना बेमानी है। यह अधिक से अधिक ‘तनाव प्रबंधन’ का मंच बन सकती है, न कि स्थायी समाधान का।