बिजली विभाग का अनोखा नियम : गाली वाले को प्राथमिकता, चाय-पानी देने वाले को बार-बार परेशानी
प्रेमशंकर के पड़ोसी थे-उग्रकुमार। दो-के-दोनों अपने नाम के बिल्कुल विपरीत स्वभाव वाले। प्रेमशंकर बेहद झगड़ालू, हथछुट एवं संस्कारहीन, वहीं उग्रकुमार शिष्ट, सीधे एवं मृदुभाषी। हुआ यह कि एक दिन आंधी का एक तेज झोंका आया और काॅलोनी में बिजली की सप्लाई बाधित हो गई। मौसम ठीक हुआ तो विद्युत-सेवा तो बहाल हुई, लेकिन इन दोनों के यहां बिजली नहीं आई। जुलाई की कष्टकारी चिपचिपी गरमी वाले महीने में बिना बिजली के रिहाइश होती भी कैसे! उग्रकुमार बाकायदा पावर-हाउस जाकर शिकायत दर्ज करा आए थे, लेकिन दो घंटे के बीत जाने तक कोई प्रगति नहीं थी। फोन करने पर बताया गया कि कर्मचारी कम हैं, समय लगेगा। प्रेमशंकर घर पर थे नहीं। जैसे ही आए, पता चला बिजली नहीं है। उन्होंने तुरंत पावर-हाउस को फोन मिलाया। आंधी के बाद पावर-हाउस को एक बार में फोन लग जाए, यह नामुकिन ही होता है। प्रेमशंकर का भी फोन नहीं लगा। जद्द-बद्द दो-चार गालियां बकते हुए दुबारा फोन किया। काॅल उधर से रिसीव हुई। क्रोध में आर्डर देते हुए बोले- “सुनो! जानकीनगर काॅलोनी में पोल नंबर सात से मेरा कनेक्शन है। पोल से फॉल्ट है। तत्काल ठीक करवाओ। आधे घंटे बाद तक काम नहीं हुआ, तो मुझे वहीं आकर तुम्हें ठीक करना पड़ेगा, समझे?”
उधर से आवाज आई- “जी, तुरंत ठीक करवाता हूं।” दस मिनट में ही सीढ़ी लिए लाइनमैन और बिजली विभाग के लोग आ गए। कनेक्शन-फॉल्ट ठीक करके प्रेमशंकर के गेट पर काॅल-बेल बजाकर कर्मचारी ने पूछा, “साहब! लाइट आ गई?” अंदर से आवाज आई थी- “हां।” उनके घर से कोई बाहर झांकने भी नहीं आया था।
इधर उग्रकुमार, जब से बिजली वाले आए थे, तब से वहीं लगे रहे। अपने घर से पेठा और ठंडा पानी भी लाकर दिए। और-तो-और चलते समय लाइनमैन को दो सौ रुपये भी यह कहते हुए दिए कि उनकी ओर से वे चाय पी लेवें।
लगभग तीन महीने बाद एक दिन शाम को उग्रकुमार के यहां की बिजली फिर गुल थी। इस बार न आंधी आई थी, न हवा का झोंका। उस समय उनके बेटे की बोर्ड की परीक्षा हो रही थी। उग्रकुमार भागकर पावर-हाउस गए थे। शिकायत दर्ज कर बेटे की परीक्षा का हवाला देकर आए थे, बिजली वाले ठीक तीन घंटे बाद आए थे। पोल से ही तार में कार्बन के कारण लाइन बाधित थी। इस बार उग्र ने उन्हें कोल्डड्रिंक पिलाई थी और चलते समय वाला शिष्टाचार तो किया ही। बिजलीकर्मी उनसे बहुत प्रसन्न रहते थे।
साल बीतते-बीतते एक बार फिर उग्र जी के यहां की बिजली बाधित हुई। पूरी काॅलोनी जगमग, उनके घर घुप्प अंधेरा। फिर वही प्रक्रिया। उग्र जी ने मन-ही-मन ईश्वर से कहा- “भगवन! ऐसा क्यों है? बिजली महारानी पूरी काॅलोनी में सबसे अधिक मेरे ऊपर ही क्यों मेहरबान हैं?”
भले ही साल-भर के अंदर ही उनके यहां यह दुर्योग तीसरी बार था, लेकिन इस बार भी उन्होंने शिष्टाचार में कोई कोर-कसर नहीं रहने दी थी। मौसम ठंडी का था। अतः घर से ही बनवाकर स्पेशल चाय पिलायी थी उन्होंने। चाय का कप लेकर जब वे घर में जा रहे थे, तभी उन्हें लगा कि बिजलीकर्मी उनकी ही प्रशंसा में कुछ कह रहे थे। इसलिए वे अपने गेट की आड़ में रुककर उनकी बातें सुनने लगे।
सीढ़ी ढोने वाले एक कर्मी ने कहा-“साहब का स्वभाव बहुत अच्छा है।” इस पर दूसरे ने कहा- “स्वभाव तो अच्छा है, लेकिन इस काॅलोनी में परेशान भी सबसे ज्यादा यही हुए हैं।” यह सुनकर लाइनमैन बोला- “क्या चाहते हो इनके पड़ोसी की लाइट तीसरे महीने खराब हो, ताकि प्रसाद भी पा जाओ?” पहले ने जिज्ञासावश लाइनमैन से पूछा- “मतलब यह भी तुम्हारे हाथ में है?” लाइनमैन ने रहस्यमय मुस्कान के साथ अपने साथियों की ओर देखा और बोला- “और नहीं तो क्या! इनका पड़ोसी बहुत हथछुट है। सुनते हैं कि इंजीनियर साहब को भी एक बार मजा चखा चुका है। इसीलिए मैंने उसका कनेक्शन बहुत सावधानीपूर्वक किया था। दो-तीन साल की छुट्टी है।” इसी बीच दूसरे कर्मी ने पूछा- “और इनका?” लाइनमैन आगे बोला-” यह साहब बड़े नेकदिल हैं। इनका कनेक्शन प्यार से करता हूं, कसकर नहीं। ऐसे लोग समाज में कम हैं। चाय-पानी कौन कहे, लोग ढंग से बात भी तो करते नहीं!” ये बातें सुनकर चौथा कर्मी बोला-“क्या नेकदिल और शिष्टाचारी व्यक्ति का काम ठीक से नहीं किया जाना चाहिए? अगले कुछ मिनट कर्मीगण और उग्रकुमार अपने-अपने व्यवहार की समीक्षा में व्यस्त दिखे थे। सुधार के लिए समीक्षा आवश्यक है और समीक्षा के लिए चौथे कर्मी। चिंता है- समाज में यह ‘चौथा कर्मी’ विलुप्त हो रहा है।
घनश्याम अवस्थी, गोंडा
