शहरीकरण और नदियां : आर्थिक लाभ बनाम पर्यावरणीय हानि

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Published By Deepak Mishra
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भारत की नदियां देश की जीवन रेखा मानी जाती हैं। शहरीकरण के कारण नदियों के बढ़ते प्रदूषण को रोकना होगा, जिससे कि भारत की अर्थव्यवस्था को सुदृण किया जा सके।

भारत की नदियां देश की जीवनरेखा मानी जाती हैं। भारत में गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र, नर्मदा, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी जैसी प्रमुख नदियां न केवल जल का स्रोत हैं, बल्कि हमारी संस्कृति, आस्था और अर्थव्यवस्था का आधार भी हैं। इन नदियों के किनारे सभ्यताओं का विकास हुआ और आज भी करोड़ों लोगों की आजीविका इन पर निर्भर है, किन्तु वर्तमान समय में बढ़ते हुई शहरीकरण के कारण नदियों का प्रदूषण एक गंभीर समस्या बन चुका है।औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और बढ़ती जनसंख्या के कारण नदियों में अपशिष्ट पदार्थों का अत्यधिक प्रवाह हो रहा है। 

कारखानों से निकलने वाले रासायनिक कचरे, सीवेज का बिना शोधन के सीधे नदियों में प्रवाह, कृषि में उपयोग होने वाले रसायनों का बहाव तथा धार्मिक गतिविधियों में प्लास्टिक और अन्य अपशिष्टों का विसर्जन, ये सभी कारक नदियों के जल को दूषित कर रहे हैं। इससे न केवल जल की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है, बल्कि जलीय जीव-जंतुओं का जीवन भी संकट में पड़ गया है और मानव स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

भारत की नदियां देश की अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। कृषि क्षेत्र में सिंचाई का प्रमुख स्रोत नदियां ही हैं, जिससे खाद्यान्न उत्पादन बढ़ता है और देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होती है। आर्थिक दृष्टि से देखें तो भारत के कृषि क्षेत्र का सकल उत्पादन (Gross Value Added – GVA) लगभग 20–25 लाख करोड़ रुपये (हाल के वर्षों के अनुमान अनुसार) है, जिसमें सिंचाई की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। अनुमानतः इस कृषि उत्पादन का 55–60% हिस्सा सीधे या परोक्ष रूप से नदी-आधारित सिंचाई से जुड़ा हुआ है। इसका अर्थ है कि नदियों के माध्यम से होने वाली सिंचाई से ही लगभग 12–15 लाख करोड़ रुपये के कृषि उत्पादन को समर्थन मिलता है।

इसके अतिरिक्त, जलविद्युत उत्पादन में भी नदियों का विशेष योगदान है, जो स्वच्छ ऊर्जा का एक प्रमुख स्रोत है। भारत में स्थापित कुल जलविद्युत क्षमता लगभग 45–50 गीगावाट (GW) के आसपास है। नेशनल हाइड्रोलिक पॉवर कॉर्पोरेशन (NHPC) तथा विभिन्न राज्य विद्युत बोर्डों द्वारा संचालित परियोजनाएं नदियों पर आधारित हैं, जैसे कि टेहरी डैम, भाखड़ा नांगल डैम और सरदार सरोवर डैम। आर्थिक दृष्टि से देखें तो भारत में जलविद्युत उत्पादन से प्रतिवर्ष लगभग 1.5 से दो लाख करोड़ यूनिट (kWh) बिजली उत्पन्न होती है। यदि प्रति यूनिट औसत दर ₹ 4–5 मानी जाए, तो जलविद्युत से होने वाला वार्षिक राजस्व लगभग ₹ 60,000 करोड़ से ₹ 1,00,000 करोड़ के बीच आंका जा सकता है। यह राजस्व केंद्र और राज्य सरकारों, बिजली वितरण कंपनियों तथा निजी क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण आय का स्रोत हैं।

कई उद्योग नदियों के जल पर निर्भर करते हैं, जैसे वस्त्र, कागज, चीनी और रासायनिक उद्योग। नदियां अंतर्देशीय जल परिवहन का भी माध्यम हैं, जिससे माल ढुलाई सस्ती और सुगम होती है। नदियों से संबंधित उद्योग भारत की अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण आधार हैं और इनके माध्यम से बड़े पैमाने पर राजस्व अर्जित होता है। गंगा, यमुना और कृष्णा जैसी नदियों के किनारे अनेक उद्योग विकसित हुए हैं, जो जल पर प्रत्यक्ष रूप से निर्भर हैं।

भारत में वस्त्र (टेक्सटाइल), कागज (पेपर), चीनी (शुगर), रासायनिक (केमिकल), खाद्य प्रसंस्करण (फूड प्रोसेसिंग) और चमड़ा (टेनरी) उद्योग मुख्यतः नदी जल का उपयोग करते हैं। अनुमानतः देश के लगभग 30–40% मध्यम और बड़े उद्योग किसी न किसी रूप में नदी जल पर निर्भर हैं। केवल वस्त्र उद्योग ही भारत में लगभग ₹ 10–12 लाख करोड़ के वार्षिक कारोबार का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें एक बड़ा हिस्सा नदी तटीय क्षेत्रों में स्थित इकाइयों से आता है।

यदि समग्र रूप से देखा जाए, तो नदी-आधारित औद्योगिक गतिविधियों से भारत को प्रतिवर्ष लगभग ₹ 15–20 लाख करोड़ तक का आर्थिक योगदान (टर्नओवर स्तर पर) प्राप्त होता है। इसमें प्रत्यक्ष उत्पादन, निर्यात और सहायक सेवाएं शामिल हैं। उदाहरण के लिए, कागज उद्योग का आकार लगभग ₹ 80,000 करोड़ से अधिक है, जबकि चीनी उद्योग भी ₹ एक लाख करोड़ से अधिक के स्तर पर योगदान देता है और ये दोनों ही उद्योग जल पर अत्यधिक निर्भर हैं।

मत्स्य पालन (फिशरीज) के माध्यम से भी लाखों लोगों को रोजगार मिलता है। भारत विश्व के अग्रणी मत्स्य उत्पादक देशों में से एक है। कुल मत्स्य उत्पादन (समुद्री+आंतरिक) हाल के वर्षों में लगभग 160–180 लाख टन प्रतिवर्ष तक पहुंच चुका है। इसमें से लगभग 70–75% हिस्सा आंतरिक जल स्रोतों, जैसे- नदियों, झीलों, तालाबों और नहरों से आता है। इसका अर्थ है कि केवल नदी एवं संबंधित जल स्रोतों से ही लगभग 110–130 लाख टन मत्स्य उत्पादन होता है।

नदियों के प्रदूषण को रोकने के लिए कई प्रभावी उपाय किए जा सकते हैं। सबसे पहले, औद्योगिक अपशिष्टों के निस्तारण के लिए कड़े नियमों का पालन सुनिश्चित करना आवश्यक है। प्रत्येक उद्योग को अपने अपशिष्ट जल का शोधन करना अनिवार्य होना चाहिए। इसके साथ ही, नगरों में आधुनिक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) स्थापित किए जाने चाहिए, ताकि गंदा पानी साफ करके ही नदियों में छोड़ा जाए।

दूसरा महत्वपूर्ण उपाय है जनजागरूकता। जब तक आम जनता को नदियों के महत्व और उनके संरक्षण के प्रति जागरूक नहीं किया जाएगा, तब तक कोई भी प्रयास पूर्ण रूप से सफल नहीं हो सकता। लोगों को यह समझाना आवश्यक है कि वे प्लास्टिक, कचरा और अन्य हानिकारक पदार्थ नदियों में न डालें। धार्मिक आयोजनों में भी पर्यावरण के अनुकूल सामग्री का उपयोग किया जाना चाहिए।

इसके अतिरिक्त, वृक्षारोपण को बढ़ावा देना भी अत्यंत आवश्यक है। नदी किनारों पर पेड़ों की हरियाली न केवल मिट्टी के कटाव को रोकती है, बल्कि जल को शुद्ध करने में भी सहायक होती है। सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाएं जैसे नमामि गंगे कार्यक्रम भी नदियों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं, किंतु इनकी सफलता के लिए जनसहभागिता अनिवार्य है।   (यह लेखक के निजी विचार हैं।)

प्रो. नीलिमा गुप्ता/ पूर्व कुलपति डॉ. हरि सिंह गौर विश्वविद्यालय।