संपादकीय:तपन भरी चेतावनी

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Published By Monis Khan
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मौसम विभाग में चेताया है कि इस साल कई इलाकों में पहले से अधिक समय तक हीट वेव चलेगी, कुछ ऐसे इलाके जो सामान्यतया कम ताप प्रभावित रहते थे, वहां भी इस बार हीट वेव का प्रकोप दिखेगा, यूपी, बिहार,एनसीआर में अप्रैल–मई की दहलीज़ पर ही पारा 40 डिग्री पार कर चुका है। संकेत साफ हैं, इस वर्ष लू का प्रकोप अधिक लंबा, ज्यादा तीव्र और बहुत व्यापक होगा। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के आकलन के अनुसार पिछले चार दशकों में हीटवेव से मौतों में 62 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जबकि आर्थिक नुकसान कई गुना बढ़ा है। 

जब देश के 80 से 87 फीसदी भूभाग गर्मी की चपेट में आने की आशंका हो, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हमारी तैयारी पर्याप्त है? कुछ शहरों ने हीट एक्शन प्लान लागू किए हैं, जिनमें अलर्ट सिस्टम, कूलिंग सेंटर, काम के समय में बदलाव और पानी की उपलब्धता जैसे कदम शामिल हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर कवरेज अभी असमान है, खासकर छोटे शहरों और कस्बों में। सबसे अधिक जोखिम में वे लोग हैं, जो खुले में काम करते हैं— रेहड़ी-पटरी वाले, दिहाड़ी मजदूर, निर्माण श्रमिक, साथ ही बच्चे और बुजुर्ग। 

इनके लिए लक्षित सुरक्षा अभी भी बिखरी हुई है। सरकारों को इसके लिए समय से सचेत होने का समय है। तात्कालिक समाधानों पर अब देरी अक्षम्य होगी, जबकि दीर्घकालिक समाधान अपनाना जटिल तो है पर अपरिहार्य हैं। शहरी हीट प्रोफाइलिंग को नीति का आधार बनाना होगा। वार्ड स्तर तक तापमान, नमी, हरित आवरण और निर्मित सतहों का नक्शा तैयार कर डिस्कंफर्ट इंडेक्स का एटलस बनाना, जिससे ‘हॉट स्पॉट्स’ की पहचान कर क्षेत्र-विशेष के लिए योजनाएं बनाई जा सकती हैं, इसे राष्ट्रीय कार्यक्रम का रूप देना होगा। 

अर्बन हीट आइलैंड को कम करने के लिए निर्माण मानकों में बदलाव करना, कूल रूफ, कूल पेवमेंट, परावर्तक पेंट, छतों पर हरियाली और जल निकायों का संरक्षण जरूरी है। ग्रीन और ब्लू इंफ्रास्ट्रक्चर पर सोचना होगा, जिसके तहत सड़कों व बाज़ारों में छायादार पेड़ लगाने, शहरी वन, पार्क और तालाब निर्मित कर होंगे। ये जीवनरक्षक ढाल बनेंगे। इसके अलावा प्रदूषण में कमी, एरोसोल और ग्रीनहाउस गैसें ताप को बढ़ाती हैं; स्वच्छ ऊर्जा और सार्वजनिक परिवहन को गति देना अनिवार्य है। कृषि पर असर भी कम गंभीर नहीं। बढ़ती गर्मी फसल अवधि घटाती है, उत्पादकता कम करती है और पानी की मांग बढ़ाती है। फसल विविधीकरण, हीट-टॉलरेंट बीज, माइक्रो-इरिगेशन और फसल बीमा का विस्तार के साथ खरीफ-रबी कैलेंडर में स्थानीय स्तर पर लचीलापन देना होगा। 

स्पेन और फ्रांस ने कूलिंग सेंटर और काम के समय में बदलाव को कानून का हिस्सा बनाया है; ऑस्ट्रेलिया ने ‘हीट हेल्थ वार्निंग सिस्टम’ को स्थानीय शासन से जोड़ा है; सिंगापुर शहरी हरियाली और जल निकायों के जरिए ताप कम कर रहा है। भारत को इन मॉडलों को अपने सामाजिक-आर्थिक संदर्भ में ढालना होगा, क्योंकि आर्थिक दृष्टि से हीटवेव उत्पादकता घटाकर जीडीपी पर सीधा प्रहार करती है, इसलिए स्पष्ट लक्ष्य, बजट और जवाबदेही के साथ सरकार के लिए यह आपदा नहीं, विकास का एजेंडा होना चाहिए। अब इस संकट पर निर्णय का समय है, तैयारी को नीति का केंद्र बनाने का।