पूर्व थलसेना प्रमुख नरवणे बोले- अप्रकाशित पुस्तक के लिए मेरा हवाला देना और मुझे घसीटना उचित नहीं था
नई दिल्ली। पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल मनोज नरवणे ने अपने अप्रकाशित संस्मरण 'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी' को लेकर इस साल की शुरुआत में हुए विवाद के संदर्भ में कहा है कि अनावश्यक रूप से उनका हवाला देना और पुस्तक के लिए उन्हें सुर्खियों में लाना ''उचित नहीं था।'' जनरल नरवणे ने कहा कि वह उस विवाद से आगे बढ़ चुके हैं और तब से दो पुस्तकें लिख चुके हैं तथा तीसरी पुस्तक जल्द आने वाली है।
उन्होंने हाल में अपनी पुस्तक 'द क्यूरियस एंड द क्लासीफाइड: अनअर्थिंग मिलिट्री मिथ्स एंड मिस्ट्रीज' का विमोचन किया था। नरवणे ने 'पीटीआई वीडियो' से साक्षात्कार में कहा, ''रक्षा मंत्रालय ने प्रकाशक से कहा था कि जब तक पुस्तक का निरीक्षण न हो जाए, इसे रोककर रखा जाए। जहां तक मेरा सवाल है, मामला वहीं खत्म हो गया था और मैं आगे बढ़ चुका हूं... इसलिए वह अध्याय बंद हो चुका है। मुझे लगता है कि अनावश्यक रूप से मेरा हवाला देना और अप्रकाशित पुस्तक को एवं परोक्ष रूप से मुझे भी सुर्खियों में घसीटना उचित नहीं था।''
कांग्रेस नेता राहुल गांधी को इस साल फरवरी में लोकसभा में इस संस्मरण के अंशों का उल्लेख करने से रोक दिया गया था, क्योंकि यह अभी प्रकाशित नहीं हुआ है। रूपा पब्लिकेशंस द्वारा प्रकाशित नरवणे की हालिया पुस्तक 'द क्यूरियस एंड द क्लासीफाइड: अनअर्थिंग मिलिट्री मिथ्स एंड मिस्ट्रीज' में भारतीय थलसेना, नौसेना और वायु सेना से जुड़े किस्सों, कहानियों और रोचक पहलुओं का जिक्र किया गया है।
नरवणे ने अपनी पुस्तक में बताया है कि सैन्य अभिवादन 'जय हिंद' को अपनाए जाने की शुरुआत कैसे हुई। उन्होंने कहा कि 'जय हिंद' का इस्तेमाल सबसे पहले भारतीय वायु सेना ने किया और बाद में थलसेना एवं नौसेना ने भी इसे अपनाया। उन्होंने कहा कि सलामी देने की मानक प्रथा मूल रूप से मौन रहना थी और विभिन्न रेजिमेंट ने 'सत श्री अकाल' या 'राम राम' जैसे अभिवादन के अपने-अपने तरीकों को जोड़ा।
नरवणे ने कहा, ''शुरुआत में 'जय हिंद' कहना वायु सेना ने शुरू किया था और अब हम तीनों सेनाओं में इसका पालन करते हैं। सलामी के साथ हम 'जय हिंद' कहते हैं और व्याख्यानों में भी 'जय हिंद' कहकर अभिवादन करते हैं।" उन्होंने कहा, ''लेकिन यह 'जय हिंद' आया कहां से? इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं। यह मेरे लिए भी एक नयी जानकारी थी। यह ऐसी बात थी, जिसके बारे में मुझे भी पता नहीं था, जबकि मैंने शायद लाखों बार 'जय हिंद' कहा होगा।''
पूर्व थलसेना प्रमुख ने असम रेजिमेंट के सैनिक बदलूराम और पेडोंगी नामक सैन्य खच्चर से जुड़े किस्सों का भी उल्लेख किया। बदलूराम 1944 में कोहिमा की लड़ाई में शहीद हुए थे, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद भी उनके नाम पर राशन आता रहा, जिससे शत्रु से घिरे सैन्य दल को युद्ध में बने रहने में मदद मिली। इस कहानी से प्रेरित होकर ब्रिटिश भारतीय सेना के अधिकारी मेजर एम टी प्रॉक्टर ने जोश भरने वाला गीत ''बदलूराम का बदन'' लिखा, जो असम रेजिमेंट का अनौपचारिक रेजिमेंटल गान बन गया और उनके कार्यक्रमों में गाया जाता है।
नरवणे ने कहा, ''...इसके बोल हैं, 'बदलूराम का बदन जमीन के नीचे है, लेकिन उसका राशन हम खाते हैं' और यह बहुत प्रसिद्ध गीत बन गया। यह बहुत जोशीला गीत है, जिस पर आप थिरक सकते हैं और यह मनोबल बढ़ाता है। कई लोगों ने यह गीत सुना है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इसकी जड़ें एक असल लड़ाई से जुड़ी हैं जिसने संभवत: भारत के इतिहास की दिशा बदल दी।''
पाकिस्तान द्वारा 1971 में पकड़े गए और बाद में बारूदी सुरंगों वाले क्षेत्रों से होकर अपनी इकाई में लौटे पेडोंगी नामक खच्चर के बारे में नरवणे ने कहा कि उस जानवर को सम्मान के साथ सेवानिवृत्त किया गया और उसने 37 वर्ष तक सेवा दी। जनरल नरवणे ने कहा, ''पाकिस्तानियों ने अपने सामान की ढुलाई में उसका इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था।
एक दिन जब उस खच्चर पर एक मशीनगन और कुछ गोला-बारूद लदा था, उसने घर लौटने का फैसला किया। वह उसे पकड़ने वालों के चंगुल से बच निकला, उसने खतरनाक इलाके एवं बारूदी सुरंगों को पार किया और अपने सहज दिशा-बोध के सहारे अपनी इकाई में लौट आया।'' उन्होंने कहा, ''एक तरह से यह वीरता, साहस और निष्ठा को दर्शाता है। इसके बाद उसे कई पुरस्कार दिए गए तथा यह भी तय किया गया कि वह अन्य खच्चरों की तरह कोई बोझ नहीं ढोएगा। उसे एक तरह से सेवानिवृत्त कर दिया गया और बरेली में 37 साल बाद प्राकृतिक कारणों से उसकी मौत हुई।''
