बहराइच : फर्जी हस्ताक्षर मामले में नगर पालिका परिषद की अधिकारी तलब

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Published By Deepak Mishra
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बहराइच। उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में जमीन विवाद, फर्जी हस्ताक्षर और एक ही तथ्य पर दो एफआईआर दर्ज होने के मामले ने नया मोड़ ले लिया है। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए नगर पालिका परिषद की अधिशासी अधिकारी प्रमिता सिंह को व्यक्तिगत रूप से तलब किया है। 

साथ ही जिलाधिकारी बहराइच को पूरे प्रकरण की प्रारंभिक जांच कर छह मई तक रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत करने का आदेश दिया है। यह मामला नगर पालिका से जुड़ी एक जमीन, उस पर दर्ज दो अलग-अलग मुकदमों और हस्ताक्षरों की सत्यता को लेकर उठे विवाद से संबंधित है। न्यायालय ने प्रथम दृष्टया माना कि प्रकरण में तथ्यों की गंभीरता, सरकारी अभिलेखों के उपयोग और हस्ताक्षरों की विश्वसनीयता की जांच आवश्यक है।

प्रकरण की शुरुआत वर्ष 2021 में हुई थी, जब थाना दरगाह शरीफ में नगर पालिका परिषद की ओर से अजमत अली उर्फ भूरी के खिलाफ जमीन संबंधी अनियमितता और कथित फर्जीवाड़े को लेकर मुकदमा दर्ज कराया गया था। इस मुकदमे में भारतीय दंड संहिता की धारा 419, 420, 467, 468, 471 तथा सार्वजनिक संपत्ति नुकसान अधिनियम की धारा 3 लगाई गई थी। 

अजमत अली का आरोप है कि विवेचना के दौरान उनके खिलाफ लगाए गए आरोप पुष्ट नहीं हो सके और पुलिस ने अंतिम रिपोर्ट लगा दी। बाद में एसीजेएम न्यायालय ने वादी पक्ष को नोटिस जारी किया और नगर पालिका की ओर से अधिकृत अधिवक्ता के माध्यम से अंतिम रिपोर्ट स्वीकार किए जाने का प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया गया।

न्यायालय ने 24 जुलाई 2025 को अंतिम आख्या स्वीकार करते हुए पत्रावली दाखिल दफ्तर कर दी। अजमत अली का कहना है कि इसी प्रकरण के तथ्यों के आधार पर दिसंबर 2025 में उनके खिलाफ थाना नगर कोतवाली में दूसरा मुकदमा दर्ज करा दिया गया। इस बार उन पर भारतीय दंड संहिता की धारा 419, 420, 465, 468, 471 और 120-बी के तहत फर्जी हस्ताक्षर, जालसाजी और साजिश के आरोप लगाए गए। 

याचिकाकर्ता का आरोप है कि एक ही तथ्य और विवाद के आधार पर दोबारा मुकदमा दर्ज कराया गया, जबकि पहले मुकदमे में अंतिम रिपोर्ट लग चुकी थी। उनका कहना है कि यह कार्रवाई सुनियोजित, दुर्भावनापूर्ण और दबाव बनाने के उद्देश्य से की गई। अपने अधिवक्ता मोहम्मद कलीम हाशमी के माध्यम से दाखिल प्रार्थना पत्र में अजमत अली ने यह भी कहा कि दूसरे मुकदमे में फर्जी हस्ताक्षर का आरोप लगाया गया, लेकिन न तो विवेचक ने और न ही विपक्षी पक्ष ने पुराने हस्ताक्षरों का मिलान कराया। 

उनका कहना है कि हस्ताक्षर की प्रामाणिकता जांचे बिना फर्जीवाड़े का मुकदमा दर्ज कराना न्यायसंगत नहीं है। याचिका में सर्वोच्च न्यायालय के एक निर्णय का हवाला देते हुए कहा गया कि जब किसी आपराधिक मामले का आधार हस्ताक्षर की सत्यता हो, तब पुराने और विवादित हस्ताक्षरों का तुलनात्मक परीक्षण आवश्यक होता है। अजमत अली ने यह भी दावा किया कि जिस जमीन को लेकर उन पर आरोप लगाए गए, उस संबंध में जिलाधिकारी कार्यालय से प्राप्त रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया कि उन्होंने नजूल भूमि की बिक्री नहीं की। 

इसके बावजूद उनके खिलाफ दोबारा मुकदमा दर्ज कराया गया। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने उपलब्ध अभिलेखों, पूर्व मुकदमे की पत्रावली और नए प्रकरण के तथ्यों का अवलोकन किया। अदालत ने पाया कि मामला केवल जमीन विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सरकारी अभिलेखों के उपयोग, पूर्व मुकदमे के निस्तारण के बाद दोबारा कार्रवाई, शपथपत्र की वैधता और हस्ताक्षर की प्रमाणिकता जैसे गंभीर प्रश्न भी जुड़े हैं। 

इन्हीं बिंदुओं को गंभीर मानते हुए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने जिलाधिकारी को निर्देश दिया कि यह स्पष्ट किया जाए कि क्या वास्तव में एक ही तथ्य पर दो अलग-अलग मुकदमे दर्ज किए गए, क्या पूर्व मुकदमे की अंतिम रिपोर्ट के बाद नए मुकदमे का आधार वैध था और क्या हस्ताक्षरों की जांच विधिसम्मत तरीके से कराई गई। 

न्यायालय ने अधिशासी अधिकारी प्रमिता सिंह को भी नोटिस जारी कर छह मई को सुबह 7:30 बजे न्यायालय में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर अपना पक्ष रखने का आदेश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि संबंधित अभिलेखों और जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे की विधिक कार्रवाई तय की जाएगी।

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