उड़ाओ-उड़ाओ कुछ तो उड़ाओ! आजकल हर कोई उड़ाने में माहिर हो गया है
आजकल हवा में एक अजीब सी ‘उड़ान’ है। राजनीति से लेकर मोहल्ले की गलियों तक, हर कोई कुछ न कुछ उड़ाने में व्यस्त है। मेरा तो मानना है कि दुनिया में जीवित रहने के लिए ‘उड़ाने’ की कला में माहिर होना बहुत जरूरी है। अगर आप कुछ नहीं उड़ा रहे, तो समझिए आप जीवन की दौड़ में ‘ग्राउंडेड’ हो चुके हैं। उड़ाना ही प्रगति का लक्षण है।
एक दौर था, जब राजनीति बड़ी शालीन और ‘सॉफ्ट’ थी। हमारे पहले प्रधानमंत्री नेहरू जी शांति के नाम पर सफेद कबूतर उड़ाते थे। तब देश को लगता था कि उड़ाने का मतलब सिर्फ शांति संदेश भेजना है। पर भाई साहब, अब जमाना ‘अपडेट’ हो गया है। अब अगर आप इतने सक्षम नहीं हैं कि अंतर्राष्ट्रीय मंच पर कबूतर उड़ा सकें, तो निराश न हों। अपने घर की मुंडेर पर बैठिए और कौवे ही उड़ाइए। आखिर कौवे उड़ाना भी एक पूर्णकालिक रोजगार है। कम से कम यह अहसास तो रहता है कि आपके हाथ हिलाने से किसी की उड़ान में खलल पड़ रहा है।
‘उड़ाने’ की यह कला हमारे मोहल्ले की रग-रग में बसी है। हमारे पड़ोस का ‘पिंटू’ इस कला का असली उस्ताद निकला। वह बरसों से छत पर चढ़कर पतंग उड़ाता था। हम समझते थे कि लड़का हवा का रुख पहचान रहा है, पर वह तो पड़ोस वाली छत का ‘सिग्नल’ नाप रहा था। एक दिन उसकी पतंग क्या कटी, पिंटू ने उस छत से लड़की ही उड़ा दी। इसे कहते हैं- ‘सावधानी हटी, और कन्या उड़ी’। अब पिंटू फरार है और मोहल्ले की शांति उड़ी हुई है।
आजकल के युवाओं का जुनून तो देखिए। शादी में जाएंगे तो ऐसे टूटेंगे जैसे बरसों के भूखे हों, देखते ही देखते प्लेटों से रसगुल्ले ऐसे उड़ाते हैं, जैसे कोई जादुई शो चल रहा हो। बाहर निकलते ही अपनी बाइक को हवाई जहाज समझकर उड़ाने लगते हैं। यमराज भी कन्फ्यूज हैं कि इन्हें ‘ओवरस्पीडिंग’ का चालान भेजें या सीधे ऊपर का टिकट। रईसी का आलम यह है कि शादियों में लोग नोट ऐसे उड़ाते हैं, जैसे रिजर्व बैंक उनके ससुर जी का हो। और पानी? पानी तो हम ऐसे उड़ाते हैं जैसे अगले जन्म में हम सब मछली बनकर ही पैदा होने वाले हों।
अभी अप्रैल का महीना चल रहा है, जिसमें अक्लमंदों की भी ‘बुद्धि’ उड़ जाती है। एक ‘अप्रैल फूल’ बोलकर किसी के भी होश उड़ाना यहां का राष्ट्रीय खेल है। रही-सही कसर होली पूरी कर देती है, जहां हम रंग और गुलाल के साथ-साथ अक्सर अपनी ‘मर्यादा’ भी हवा में उड़ा देते हैं। और अगर आपके पास उड़ाने के लिए नोट या गुलाल नहीं है, तो सबसे सस्ता उपाय है-अफवाह उड़ाना। एक छोटी सी अफवाह उड़ा दीजिए कि “कल से नमक मिलना बंद हो जाएगा,” और फिर पूरे शहर की नींद उड़ते देखिए। उड़ाने में क्या जाता है? बस याद रखिएगा, जब आपकी उड़ाई हुई अफवाह से शहर का माहौल उड़ेगा, तो पुलिस भी ‘उड़ती’ हुई आएगी। फिर वह आपको ऐसे उड़ाएगी कि आपको अपनी ‘लैंडिंग’ का पता भी नहीं चलेगा।
दुनिया के मंच पर ट्रंप बाबू को देखिए। वे तो ‘उड़ाने’ के ग्लोबल ब्रांड एंबेसडर हैं। वे रोजाना सुबह उठकर कुछ न कुछ उड़ा देते हैं-कभी कोई समझौता, कभी कोई ट्वीट और कभी-कभी तो अपने विरोधियों के होश। उनकी डिक्शनरी में ‘शांति’ का मतलब अपनी ही धुन में सब कुछ उड़ा देना है। उड़ाने के इस खेल में दलाल पथ कैसे पीछे रह सकता है?
यहां तो उड़ान का सीधा संबंध ट्रंप बाबू के एक ट्वीट या उनके ‘मूड’ से है। ट्रंप बाबू सोशल मीडिया पर अपनी उंगलियां घुमाते हैं और इधर सेंसेक्स रॉकेट बनकर उड़ने लगता है। खुशी में निवेशक अपनी टोपी उड़ाने लगते हैं, लेकिन अगले ही पल, जब ट्रंप बाबू का इरादा बदलता है, तो बाजार ऐसा गोता लगाता है कि शेयर नहीं, सीधे शेयर धारक ही उड़ जाते हैं। बेचारा छोटा निवेशक समझ ही नहीं पाता कि वह ‘बुल’ की सवारी कर रहा है या उसकी खुद की बलि (कटाक्ष) दी जा रही है। यहां ‘मुनाफा’ उड़े न उड़े, मिडिल क्लास की ‘बचत’ जरूर हवा में उड़ जाती है।
‘उड़ाने’ का असली मजा तो तब आता है, जब निशाना सही हो। सीमा पार बैठे कुछ आतंकी बरसों से हमारी शांति को बम से उड़ाने का ख्वाब देख रहे थे। उन्हें लगता था कि भारत सिर्फ ‘कड़ी निंदा’ के कागज उड़ाएगा, लेकिन जब उन्होंने पहलगाम में जरा सी हरकत की, तो हमारी सेना ने पाकिस्तान में घुसकर उनके ठिकानों की ऐसी धज्जियां उड़ाईं कि उन्हें पता ही नहीं चला कि वे जमीन पर हैं या जन्नत में! अब वहां आतंकी नहीं, बल्कि उनके आकाओं के होश उड़ रहे हैं।
जब पूरा देश उड़ाने पर आमादा हैं, तो वैज्ञानिक क्यों पीछे रहें? भारत ने तो अब चांद तक रॉकेट उड़ा दिया है। दुनिया देखती रह गई और हम तिरंगा लेकर सीधे अंतरिक्ष में उड़ गए। तो प्यारे, खाली मत बैठिए। उड़ाने की कला में निपुण बनिए। कुछ भी उड़ाइए।
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